कुदरत का फ़ैसला
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۳، صفحہ ۶۶
उसक वारिस या उसक जानन वाला अपना ज़िम्मदारा सिर्फ़ यह समझत ह कि सामाजी रिवाज के मुताबिक़ उसकी आख़िरी रस्में (अंतिम संस्कार) अदा कर दें। हिन्दू अपने रिवाज के अनुसार, और मुसलमान और दूसरी क़ौमें अपने रिवाज के अनुसार। लेकिन सिर्फ़ इतना ही काफ़ी नहीं। हक़ीक़त यह है कि दूसरे आदमी की मौत ख़ुद अपने लिए मौत की ख़बर है। मौत का असली फ़ायदा यह है कि मरने वाले की मौत को देख कर ज़िन्दा रहने वाले अपने मरने को याद करें। वे दूसरे के अंजाम को देख लें। मौत से नसीहत लेना सबसे बड़ा काम है, लेकिन यही वह काम है जिसको करने वाला आज की दुनिया में कोई नहीं। कुरआन में यह ख़बर दी गई है कि अख़िरकार इन्साफ़ का एक दिन आने वाला है जबकि तमाम इन्सानों को जमा करके उनके अमल के मुताबिक़ उनको सज़ा या इनाम दिया जाएगा। यह ख़बर दुनिया की मौजूदा हालत के ठीक मुताबिक़ है। इन्सान की अर्थपूर्ण रचना इस ख़बर में अपनी व्याख्या पा लेती है। इस तरह इन्सान के बोलने और अमल करने की रिकार्डिंग की व्यवस्था जो मौजूदा दुनिया में पाई जाती है वह इस ख़बर के बाद पूरी तरह समझने लायक़ बन जाती है। (तज़किर-उल-कुरान, तशरीह सूरह इंफीतार, नंबर 82)
सम्पादकीय टिप्पणीः बोलने और अमल करने की रिकार्डिंग की
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