जन्नत, जहन्नम
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۳
चाहिए आह, वह इन्सान जो सब कुछ जान मगर वहा बात न जान जिसका उस सबसे ज़्यादा जानना चाहिए। यह बेशक सबसे बड़ी भूल है। एक वक़्त आएगा कि आदमी अपनी इस भूल को जानेगा। पर वह जानना सिर्फ़ हसरत के लिए होगा न कि खोए हुए को पाने के लिए। क़ियामत का तूफ़ान 29 मई 1990 को दिल्ली में एक सख़्त आंधी आई। उसकी रफ़्तार 75 किलोमीटर प्रति घंटा थी। यह आंधी 45 मिनट तक चलती रही। कितने ही दरख़्त उखड़ गए। बेशुमार शाखें टूट कर गिर पड़ीं। एक भारी दरख़्त टूट कर एक मोटरकार के ऊपर गिर पड़ा। उसके नीचे कार की बाडी कुचल गई। आंधी कुदरत की एक आम अभिव्यक्ति है, जिसका दर्शन लोगों को बार-बार होता रहता है। फिर भी आम तौर पर ये आंधियाँ एक ख़ास हद के अन्दर रहती हैं। इसकी वजह से कुछ वक्ती नुकसान तो होता है, मगर उसका नुकसान सम्पूर्ण विनाश तक नहीं पहुंचता। जो आंधी 75 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से चलती है, वह 75 सौ या 75 हज़र किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से भी चल सकती है। इसी तरह जो आंधी हमारी ज़मीन पर 45 मिनट तक चलती रहती है, उसके लिए यह भी मुमकिन है कि वह 45 सौ दिन तक लगातार अपनी तबाहीियों के साथ जारी रहे। A heavy dust storm uprooted trees in the Capital on Tuesday. A car in Connaught Place was quashed under the impact.