سادہ حل
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۵
तर पर चुनता था। आदमी मजबूर था कि लगातार चुनॉतियां का सामना करत हुए वह इस कठिन माहौल में ज़िन्दा रहने की कोशिश करे। सभ्यता की ख़राबियों से दूर इस सादा माहौल में एक नस्ल बनना शुरू हुई। ये ऐसे लोग थे, जिनके हालात ने उन्हें मानवीय औपचारिकताओं से दूर कर रखा था। वे बनावटी नैतिकता से अपरिचित थे। वे एक ही मार्गदर्शन को जानते थे और वह प्रकृति का मार्गदर्शन था। प्रकृति बेशक बेहतरीन शिक्षक है, और रेगिस्तान की यह नस्ल इसी शिक्षक के तहत तैयार हुई। सूरह आले-इमरान की उपरोक्त आयत में बेहतरीन उम्मत की दो विशेषताएं बताई गई हैं। एक यह कि वे ‘मारूफ़’ का हुक्म देने वाले और ‘मुन्कर’ से रोकने वाले हैं। यानी असत्य को बर्दाश्त न करना और सत्य से कम किसी चीज़ पर राज़ी न होना, यह उनका स्थायी स्वभाव है। वे उन लोगों में से नहीं जो अपने आसपास से ग़ैर ज़िम्मेदार रह कर ज़िन्दगी गुज़ारते हैं या जिनका रवैया केवल निजी स्वार्थ से जुड़ा होता है। बल्कि वे पूर्ण रूप से सत्यवादी और हक़पसन्द हैं। हक़ और नाहक की बहस में न पड़ना, या नाहक से समझौता करके ज़िन्दा रहना उनके लिए संभव नहीं। उनकी दूसरी विशेषता यह बताई गई है कि वे अल्लाह पर ईमान रखते हैं। दूसरे शब्दों में यह कि उन्होंने ख़ुदा की पहचान या ‘बोध’ को पाया है। वे ऊपरी सतह पर जीने वाले लोग नहीं हैं। उन्होंने सर्वोच्च सच को खोजा है। उनकी चेतना पाए हुए इन्सान की चेतना है। उन्होंने सृष्टि के पीछे सृष्टा का साक्षात्कार किया है। ये दोनों गुण बेहद दुर्लभ गुण हैं। सत्य और बोध को उपलब्ध वही लोग हो सकते हैं