ख़ुदा का सबूत
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۲
जो शख़्स किसी मक़्सद के लिए दुनिया में जाना चाहता हो, उसके लिए ज़रूरी है कि वह होश की ज़िन्दगी गुज़ारे, वह अपनी सरगरमियों पर नज़र रखे। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो इस भौतिक दुनिया में हर वक़्त इस बात की संभावना है कि आदमी ऐसे बन्धनों में अपने आपको फंसा ले जिसके बाद वह ऊपर से ज़िन्दा तो नज़र आता हो, मगर मक़्सद के लिहाज़ से उसने खुदकशी कर ली हो। दुनिया की नुमाइशी चीज़ों में दिलचस्पी, भौतिक साज़ो-सामान की बहुतायत, सतही कामों में पड़ना, ग़ैरज़रूरी आदतों में अपने को डालना, घटिया लिट्रेचर पढ़ना—ये चीज़ें आदमी को मक़्सद से दूर कर देती हैं। उसके वक़्त को ग़ैरज़रूरी चीज़ों में लगा देती हैं। उसके जज़्बात और एहसास को मक़्सद के बारे में कमज़ोर करके दूसरी चीज़ों के बारे में तीव्र कर देती हैं। उसको ऐसे सम्बन्धों और ऐसे तक़ाज़ों में उलझा देती हैं कि वह न चाहने के बावजूद दूसरी तरफ़ खिंचता चला जाता है। यहां तक कि अपने मक़्सद से दूर हो जाता है। अगर आपको इस्लाम से लगाव है और आप इसको अपना मक़्सद बना कर इसी के लिए जीना और इसी के लिए मरना चाहते हैं तो आपके लिए ज़रूरी है कि अपनी अमली ज़िन्दगी, अपने ताल्लुक़ात और अपनी रोज़ाना की मसरूफ़ियतों का इसके साथ तालमेल रखें, आप दोनों में कोई विरोधाभास पैदा न होने दें। इस मामले में आपको उस हकीम की तरह बन जाना चाहिए जो अपनी उंगलियों तक की इस हैसियत से हिफ़ाज़त करता है कि वे ऐसे हालात से दो-चार न हों कि वे नब्ज़ देखने की सलाहियत को खो दें। फिर एक मुलसमान का मक़्सद इससे ज़्यादा नाजुक और
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