Al-Risala · July 2023 · page 13

ख़ुदा का सबूत

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۳

जुड़ा अमल भी कभी बमक्सद होता है। ऊपर से देखने में आदमी मक़सद का सा अमल कर रहा होता है, मगर हक़ीक़त में उसके अमल का मक़सद से कोई ताल्लुक़ नहीं होता। एक मिसाल लीजिए। हमारे यहां जो मज़हबी फ़िरके हैं उनकी शुरुआत भी अस्ल में एक मक़सदी गिरोह की हैसियत से हुई थी। वे एक ख़ास मिशन लेकर उठे थे, मगर हर शख़्स जानता है कि आज वे अपनी मक़सदी हैसियत को खो चुके हैं। वह एक तहरीक के बजाए एक ठोस क़िस्म की रिवायती अंजुमन बन कर रह गए है। इसका मतलब यह नहीं कि उनकी मक़सदी धारणा उनके ज़ेहन से निकल गई और न ऐसा है कि मक़सद के लिए काम करना उन्होंने छोड़ दिया है। ये सब चीजें आज भी किसी न किसी शक्ल में उनके अन्दर पाई जाती हैं। मगर उनमें अब वह स्पिरिट बाक़ी न रही, जो एक मिशन के अलमबरदार के अन्दर होती है। अब उनका मक़सद महज़ एक बहस और बातचीत का विषय है, जिस पर वह कभी आपस में, कभी दूसरों से बातें कर लेते हैं। उनके रिसाले और अख़बार निकलते हैं। मगर इन रिसालों और अख़बारों की हैसियत मक़सदी पर्चों से ज़्यादा कारोबारी संस्थाओं की है। उनके इजितमे और सभा सम्मेलन भी होते हैं, मगर उन इजितमों की हैसियत किसी मक़सदी सरगर्मी की नहीं, बल्कि वह बीते हुए वक़्त की पड़ी हुई एक लकीर है, जिस पर वे रस्मी तौर पर चले जा रहे हैं। उनके जमाअती फंड भी हैं, जिनमें वे अपनी आमदनी का एक हिस्सा देते हैं। मगर यह देना ज़्यादातर एक जमाअती तक़ाज़े के तहत होता है न कि हक़ीक़त में अल्लाह के रास्ते में देने के जज़्बे के तहत। वे अपने ख़यालात को फैलाने के लिए

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