कुरआन आधुनिक साइंस पर बाज़ी ले जाता है।
الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۳، صفحہ ۱۲
कि इनस तात्पर्य पट का दीवार, गर्भाशय का पर्दा और बच्चादानी का अन्दरूना झिल्ली है। एक दूसरी आयत में बताया गया है कि बाद में बूंद को खून के लोथड़े (मुज़ग़ा) में तब्दील कर दिया जाता है। अरबी में मुज़ग़ा का लफ़्ज़ जोंक के लिए आया है। डा. मूर और दूसरे विशेषज्ञों का ख़्याल है कि अरब में पाई जाने वाली जोंक और 24 दिन के भ्रूण में हैरतअंगेज़ तौर पर समरूपता पाई जाती है। फिर यह कि इस चरण पर भ्रूण गर्भाशय की दीवार से जोंक की तरह लिपट जाता है। आगे की एक आयत कहती है कि यह जोंकनुमा लोथड़ा बाद में चबाई हुई चीज़ की शक्ल इख़्तियार कर लेता है। इस चरण में भ्रूण की शक्ल को समझाने के लिए डा. मूर ने प्लास्टिक की एक छोटी-सी चीज़ तैयार की और फिर उसे अपने दांतों से चबाया और फिर उसे दिखाते हुए कहा कि 28 दिन के भ्रूण की शक्ल हूबहू ऐसी होती है और उस पर जो निशान पाए जाते हैं वे भी दांतों के निशानों जैसे होते हैं। इस आयत से यह भी मालूम होता है कि इस अवस्था में जिस्म के चंद ही अंगों की शनाख़्त हो सकती है और हक़ीक़त भी यही है कि सिर्फ दिल और आंखों की पहचान मुमकिन होती है। डा. मूर ने कहा कि क़ुरआन की आयतें कहती हैं कि तेज़ी से निकलने वाले वीर्य के एक बेहद छोटे हिस्से में जनन क्षमता रखने वाले शुक्राणु पाए जाते हैं। डा. मूर ने बताया कि जिस हक़ीक़त को स्पैलिनज़ैनी ने अठारहवीं सदी ईस्वी में पहचाना, जब उसने प्रयोगात्मक तरीके से साबित किया कि जब तक नर और मादा के प्रजनन तत्वों का आपसी मेल न हो तो दैवीय अस्तित्व प्रकट नहीं हो सकता। क़ुरआन ने इससे ग्यारह सदियों पहले 'मख़्लूत क़तरे' के बारे
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