कम पर राज़ी होना
الرسالہ، ستمبر ۲۰۲۳، صفحہ ۱۵
न इस्लाम के दुशमनों को इतना कमज़ोर कर दिया कि वे इस्लाम के लिए कोई ताक़तवर ख़तरा न बन सकें। आज भी ख़ुदा की यह मदद ज़ाहिर हो सकती है, बशर्ते मुसलमान अपने अमल से उसका वही इस्तहक़ाक़ (उपादेयता, पात्रता) साबित कर सकें जो पहले दौर के मुसलमानों ने अपने अमल से साबित किया था। अल्लाह की मदद की बेशुमार सूरतें हैं। यह अल्लाह ही को मालूम है कि वह किस सूरत में किसके लिए अपनी मदद भेजेगा। फिर भी यह यक़ीनी है कि जो लोग अल्लाह पर सच्चा ईमान लाएं और उसकी मर्जी पर चलें, उनके हक़ में अल्लाह की मदद ज़रूर आती है, चाहे वह एक सूरत में आए या दूसरी सूरत में।
कम पर राज़ी होना
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम मदीना में थे। आपने ख़्वाब देखा कि अपने सहाबियों के साथ मक्का में दाखिल हुए। आपने वहां तवाफ़ (परिक्रमा) और सअइ किया। कुर्बानी और सर मुंडाया। आपने अपना ख़्वाब सहाबियों को बताया तो वे बहुत ख़ुश हुए। उन्होंने समझा कि यह अल्लाह की तरफ़ से उमरा की बशारत (ख़ुशख़बरी) है। आप और आपके सहाबी मक्का से 9 मील फ़ासिले हुदैबिया पंहुचे थे कि कुरैश ने आगे बढ़ कर आपको रोक दिया। और कहा कि हम आप लोगों को मक्का में दाख़िल होने नहीं देंगे। इसके बाद दोनों के दरम्यान बातचीत
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