عورت کا میدانِ کار
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۳، صفحہ ۵
अन्दर बरतरी और बड़प्पन का जज़्बा लिए हुए हो क्योंकि यहाँ जज़्बा उसके अन्दर उभारा गया था । यह मानसिकता एकता की क़ातिल है। एकता उस वक़्त कायम होती है जबकि एक शख़्स को बड़ा बना कर बाक़ी तमाम लोग उसके मुक़ाबले में छोटे बनने पर राज़ी हो जाएं। मगर मुसलमानों की गर्व की मानसिकता इसमें रुकावट है। इसका नतीजा यह है कि अब हर आदमी सरदार बनना चाहता है। हर आदमी चाहता है कि उसकी बात चले। हर आदमी चाहता है कि हाकिमाना सीट पर बैठे। ऐसी हालत में एकता कायम होना मुमकिन नहीं। और मुसलमानों की यही वह मानसिकता है, जिसने आज उनके दरमियान किसी भी एकता को सरासर नामुमकिन बना दिया है। मौजूदा ज़माने के मुसलमानों का अस्ल मसला सत्ता को खोना नहीं, बल्कि इन्सानी गुणों को खोना है। मौजूदा मुसलमान अपने रहनुमाओं और लीडरों की ग़लत रहनुमाई के नतीजे में ऊंचे मानवीय गुणों से खाली हो गए हैं। अब सबसे पहला ज़रूरी काम यह है कि मुसलमानों के अन्दर वे गुण पैदा किए जाएं जो आला इन्सानियत का निर्माण करते हैं। जब तक यह काम नहीं किया जाएगा मुसलमानों के हालात बदल नहीं सकते। कोई दूसरी कोशिश चाहे वह कितने ही बड़े पैमाने पर की जाए, मुसलमानों के लिए किसी नए भविष्य का निर्माण नहीं कर सकती। इच्छा-सूची
‹ Previous page Next page › Contents of November 2023 All issues