عورت کا میدانِ کار
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۳، صفحہ ۴
किताब म जापानी प्राफ़सर न लिखा ह कि जापानो का वयाक्तिक मिज़ाज यह होता है कि वह समझता है कि मैं किसी के मातहत हूं, I am under someone दूसरे लफ़्ज़ों में यह कि हर जापानी अधीनता-भाव में जीता है। इसलिए जब भी कोई सामूहिकिता कायम होती है तो वह फ़ौरन उससे जुड़ जाता है। वह तन्ज़ीम यानी संगठन के नेता को फ़ौरन अपना नेता मान लेता है, क्योंकि वह पहले ही से यह माने हुए था कि मैं किसी के मातहत हूं—यह है जापानियों की उस एकता का राज़ जिसके नतीजे में उन्होंने मौजूदा ज़माने में अप्रत्याशित तरक्की की है। अब मौजूदा ज़माने के मुसलमानों को देखिए। मुसलमानों का मामला जापानियों के बिल्कुल बरअक्स है। मसजिद से लेकर सियासत तक कोई मामला ऐसा नहीं, जिसमें मुसलमान मुत्तहिद या एक हों। मौजूदा मुसलमान दुनिया की सबसे ज़्यादा बरबाद क़ौम हैं, और इसकी सबसे बड़ी वजह बेशक उनमें इत्तिहाद और एकता का न होना है। इस 'बेइत्तिहादी' ने एक अरब इन्सानों की महान् क़ौम को दुनिया की सबसे कमज़ोर क़ौम बना दिया है। मौजूदा मुसलमानों की इस 'बेइत्तिहादी' का सबब क्या है? इसका सबब, दोबारा, उनके लोगों का वह ग़लत मिज़ाज है जो किसी भी इत्तिहाद की राह में एक स्थायी रुकावट बन गया है। मौजूदा ज़माने में जब मुसलमान पस्ती, मग़्लूबियत और पतन का शिकार हुए तो उनके रहनुमाओं की तशख़ीस (मर्ज़ की जांच) यह थी कि पश्चिम के प्रभाव
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