Al-Risala · January 2023 · page 52

اقوال حکمت

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۳، صفحہ ۵۲

करेगा। कि दुनिया में कस-कस कमता माक थ जबकि वह खुदापरस्ती का सबूत देकर आख़िरत में उसका इनाम पा सकता था। मगर उस वक्त उसने मौके खो दिए और अब ये मौक़े कभी उसके लिए आने वाले नहीं। मौक़े को खो देने का एहसास बेशक सबसे बड़ी नफ़सियाती (मनोवैज्ञानिक) सज़ा होगी, जो हमेशा-हमेशा आदमी को तड़पाती रहेगी। दूसरी जगह क़ुरआन में कहा गया है:

और बेशक यह याददिहानी है डरने वालों के लिए और हम जानते हैं कि तुम में इसके झुठलाने वाले हैं, और वह मुंकिरों के लिए पछतावा है। (69: 48-50) दुनिया में बार-बार आदमी के सामने ऐसे मौक़े आते जबकि वह कोई अमल (काम) करके आख़िरत का इनाम हासिल कर सके। मगर आदमी, कुरआन के मुताबिक, ज़ुल्म और घमंड (27: 14) की बिना पर मतलूबा (वांछित) अमल नहीं करता। ऐसे लोग जब दुनिया से निकल कर आख़िरत में पहुंचेंगे तो अचानक वह महसूस करेंगे कि यहां उनके लिए हसरत और पशेमानी के सिवा और कुछ नहीं। अब एक-एक करके उन्हें वे गुज़रे हुए लम्हे याद आएंगे जबकि उनके सामने आख़िरत के लिए अमल करने का एक मौक़ा आया, पर उन्होंने इस मौक़े को बेदर्दी से खो दिया। उस वक्त आदमी कहेगा कि आह मेरे सामने हक़ बात ज़ाहिर हुई, जिसका साथ देकर मैं हक़ (सच्चाई) का मानने वाला बन सकता था। मुझे मौक़ा मिला कि मैं हक़ को उसके हक़दार के हवाले कर दूं। मुझे यह मौक़ा मिला कि मैं हक़ की गवाही देने वाला बनूं। मुझे यह मौक़ा मिला कि मैं दुरुस्त बात कहूं चाहे वह मेरे मुवाफ़िक हो या मेरे ख़िलाफ़। मुझे मौक़ा मिला कि मैं उन लोगों में से बनूं जो खुदा के ख़ौफ़ से अपनी ज़बान बंद कर लेते हैं, पर उन मौक़ों को मैंने खो दिया। मैं अपने आपको खुदा के चाहे हुए बंदों में शामिल नहीं कर सका। मैंने दुनिया में नेकी के मौक़े को खोया था, इसीलिए आख़िरत में इनाम के मौक़े में भी अब मेरा कोई हिस्सा नहीं। अल्लाह वाले वो हैं जो क़ुरआन वाले हैं

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