اقوال حکمت
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۳، صفحہ ۵۳
दुनिया की कुल मुस्लिम आबादी का 40 फ़ासद हिस्सा मुस्लिम अल्पसंख्यक का है (पेज 2)। जामिया अज़हर काहिरा (मिस्र) में एक इस्लामी कान्फ्रेंस हुई। इस मौक़े पर तक़रीर करने वालों में डा. अब्दुस्सबूर मरज़ूक भी थे। उन्होंने अपनी तक़रीर में बताया कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मुल्कों के मुसलमान अपने मुल्क के बहुसंख्यक वर्गों की ज्यादतियों का शिकार हो रहे हैं। यहां तक कि उनके हाथों मौत से दो-चार होने वाले मुसलमानों की तादाद तीन करोड़ तक पहुंच चुकी है। उन्होंने मुस्लिम मुल्कों के विदेश मंत्रियों से अपील की कि वे मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मसलों को हल करने की कोशिश करें (अख़बार अल-आलामुल इस्लामी, 6 मार्च 1989, पेज 1)। यह किसी एक शख़्स की बात नहीं है। मौजूदा ज़माने के तमाम मुस्लिम रहनुमा एक या दूसरी शक्ल में इसी बात को दोहरा रहे हैं। मगर इस मामले में हमारे रहनुमा अब तक जो कुछ करते रहे हैं वह सिर्फ़ यह है – बहुसंख्यक वर्ग या ग़ैर-मुस्लिम हुकूमत के ख़िलाफ़ फ़रियाद या विरोध करना। मगर यह मामला इससे ज़्यादा संगीन है। यह हमको ग़ैर-मुस्लिम ताक़त के ख़िलाफ़ विरोध प्रकट करने से ज़्यादा अल्लाह की तरफ़ रूजू करने की दावत देता है, यानी अल्लाह की तरफ़ झुकने और उससे लौ लगाने पर उभारता है। क़ुरआन में बताया गया है कि एक छोटी जमाअत भी बड़ी जमाअत पर ग़ालिब आ जाती है, अल्लाह के इज़्न (मर्ज़ी) से, और अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है (2:249)। यह आयत बताती है कि मुसलमानों के किसी गिरोह को अगर अपने माहौल में ज़ोर हासिल न हो तो उन्हें यह समझना चाहिए कि वह इज़्नुल्लाह से महरूम हो गए हैं। ऐसी हालत में उन्हें कुरान के अल्फाज़ में 'अल्लाह की तरफ़ दौड़ने' (51:50) के हुक्म
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