Al-Risala · January 2023 · page 57

اقوال حکمت

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۳، صفحہ ۵۷

निकल: ऐ अल्लाह के रसूल, हम जाहिलियत और बुराई में पड़ थे, यहां तक कि अल्लाह ताआला इस ख़ैर (भलाई) को ले आया। इस तरह जो ईमान मिलता है, वह उससे बिल्कुल अलग होता है जो परम्परा या अनुकरण से आदमी को मिल जाए। परम्परा या अनुकरण वाला ईमान आदमी को अन्दर से नहीं हिलाता, उसे बदलता नहीं है, जबकि 'मारिफ़त' वाला ईमान आदमी को हमेशा हमेशा के लिए हिला देता है, उसे बदल देता है। अनुकरण वाले ईमान से आदमी के अन्दर कोई अपनी निगाह पैदा नहीं होती, जबकि 'मारिफ़त' वाला ईमान आदमी के अन्दर अपनी निगाह पैदा कर देता है, जिससे वह चीज़ों को देखे और अपने आंतरिक बोध और अपनी निगाह से फ़ैसला कर सके। अनुकरण वाले ईमान से सिर्फ़ जड़ और बेजान अक़ीदा पैदा होता है। जबकि 'मारिफ़त' वाला ईमान आदमी के अन्दर इन्किलाब बन कर दाख़िल होता है। वह आदमी की सोच और अमल की दुनिया में एक तूफ़ान, एक खलबली पैदा कर देता है। अनुकरण वाले ईमान से बेजान लोग पैदा होते हैं, जबकि 'मारिफ़त' वाले ईमान से जानदार लोग जन्म लेते हैं। और जानदार लोग ही वे लोग हैं जो इतिहास बनाते हैं, जो इन्सानियत के लिए कोई नया भविष्य बनाते हैं। अनुकरण वाला ईमान आदमी को अपनी क़ौम से मिलता है और 'मारिफ़त' वाला ईमान सीधे अल्लाह ताआला से। आख़िर वक़्त तक अल्लाह पर यक़ीन रमूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हिजरत के लिए मक्का से निकले तो पहले तीन दिन तक ग़ारे-सौर में ठहरे। कुरैश के लोग आपको तलाश करते हुए इस ग़ार (गुफा) तक पहुंच गए। अबू बक्र रज़िअल्लाहु अन्हु ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कहा: ऐ ख़ुदा के रसूल, दुश्मन इतने क़रीब आ चुका है कि

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