अल्लाह की याद सबसे बड़ी इबादत
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۳، صفحہ ۶۲
यह ख़ुदाई ज़ह्न से निकला हुआ कलाम है। क़ुरआन में हिदायत का सामान है। वह इन्सान की उस तलाश का जवाब है कि वह ज़िन्दगी का अर्थ समझ सके। उसकी प्रकृति जिस रहनुमाई को मांग रही है, क़ुरआन में वह उसको साफ़ और मुकम्मल तौर पर पा लेता है। क़ुरआन उसके तमाम अन्दरूनी सवालों का जवाब देता है। मगर यह हिदायत किसी को अपने आप नहीं मिल जाती। इसको वही शख़्स पाता है जिसके अन्दर सच्ची तलब हो, जो यह आग्रह न करे कि वह आंख से देख कर ही किसी बात को मानेगा। बल्कि वह अपने अन्दर के बोध से समझ में आने वाली बातों पर यक़ीन करने के लिए तैयार हो, जो सबसे बड़ी सच्चाई (ख़ुदा) के आगे झुक कर उस बात का सबूत दे कि वह झूठी ख़ुदापरस्ती से पाक है, जो अपनी कमाई में दूसरे का हिस्सा लगा कर यह ज़ाहिर करे कि उसकी अपनी ज़ात से बाहर पाए जाने वाले तक़ाज़ों को मानने के लिए उसका सीना खुला हुआ है, जो इन्सानी सीमाओं को मानते हुए बाहरी हिदायत की ज़रूरत को स्वीकार करता हो, जो इस सवाल को अहमियत दे कि मौजूदा दुनिया का अधूरा व नामुकम्मल होना एक ज़्यादा मुकम्मल दुनिया के होने का तक़ाज़ा करता है। यह सच्ची तलब के लक्षण हैं। क़ुरआन में कहा गया है कि ऐसे ही लोगों के हिस्से में हिदायत आती है और वे ही इस कायनात में कामयाबी की मंज़िल तक पहुंच सकते हैं (2:1-5)। इस्लामी ज़िन्दगी की शुरुआत ईमान से होती है। एक शख़्स को जब इस बात की पहचान हो जाए कि इस कायनात को बनाने वाला, इसका मालिक, इसे पालने वाला यानी इसका रब अल्लाह है; वह उसको इस तरह अपनी चेतना का हिस्सा बना ले कि अल्लाह ही उसका सब कुछ बन जाए; वह उसी पर भरोसा करे; उसी से उम्मीद रखे; उसी से ख़ौफ़ खाएं; अपनी ज़िन्दगी को पूरी तरह उसी के रुख़ पर डाल देने का फ़ैसला करे तो इसी का नाम ईमान है। ईमान के बाद चार इबादतों को इस्लाम में 'अरकान' (स्तंभ) का दर्जा हासिल है
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