Al-Risala · January 2023 · page 63

अल्लाह की याद सबसे बड़ी इबादत

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۳، صفحہ ۶۳

आता रहता है। अगर आदमी अपन सिवा दूसरा को सहन का मिज़ाज न रखता हो; अगर वह दूसरों को बर्दाश्त करते हुए दूसरों के साथ मिलकर चलने के लिए तैयार न हो तो मौजूदा दुनिया में वह सच्चाई के सफ़र को कामयाबी के साथ तय नहीं कर सकता। यह ईमान और यह इबादत अगर सच्चे तौर पर आदमी के अन्दर पैदा हो जाए तो उसके अन्दर वह ख़ुदापरस्ताना ज़िन्दगी उभरती है, जो कायनात का मालिक अपने बन्दों से चाहता है। दुनिया में उसकी हस्ती का होना हक़, सच्चाई और इंसाफ़ का होना बन जाता है। उसकी सोच, उसका अख़लाक़, ,उसका बरताव, उसके मामलेात, सब अल्लाह के रंग में रंग जाते हैं। यही दीने इस्लाम है और यही वह चीज़ है, जिसको सिखाने के लिए कुरआन उतारा गया। कुरआन को क़लम के ज़रिए किताब की सूरत में लिखवाकर इन्सान के हवाले किया गया है। यह इस बात की पूरी व्यवस्था थी कि वह किसी भी तब्दीली के बग़ैर अगली नस्लों तक पहुंच सके। कुरआन आज मुकम्मल तौर पर ‘महफ़ूज़’ व पूरी तरह सुरक्षित हालत में मौजूद है। इसके मानने वाले भी बेशुमार तादाद में दुनिया भर में पाए जाते हैं। मगर कुरआन वाली ज़िन्दगी अमली तौर पर कहीं नज़र नहीं आती। कुरआनी संभावनाएं उसी तरह बन्द हालत में पड़ी हुई हैं, जिस तरह चन्द सौ साल पहले भाप और बिजली की ताक़तें बन्द पड़ी हुई थीं। ऐसा क्यों है? इस सवाल के जवाब को उस वक़्त तक समझा नहीं जा सकता, जब तक ख़ुदा की सुन्नते - इम्तिहान को सामने न रखा जाए । मौजूदा दुनिया इम्तिहान की जगह है। यहां कुरआन को मानने वाले और कुरआन को न मानने वाले दोनों अपना-अपना इम्तिहान दे रहे हैं। दोनों क़िस्म के लोगों को एक जैसी आज़ादी हासिल है। कोई शख़्स कुरआन का इन्कार करके गुमराह होना चाहे तो उसको भी पूरी आज़ादी है। और कोई कुरआन को मान कर अमली तौर पर कुरआन के ख़िलाफ़ चलना चाहे तो उसके लिए भी रास्ता खुला हुआ है। कुरआन को न मानना किसी के

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