अल्लाह की याद सबसे बड़ी इबादत
الرسالہ، جنوری ۲۰۲۳، صفحہ ۶۶
जिसमे खुद अपना ही जाच पड़ताल करन पर सबस ज़्यादा ज़ार दिया गया हो। जा लाग आरज़ुओं और खुशुख्यालियों की दुनिया में जी रहे हों वे किसी ऐसे पैग़ाम को अपने लिए अजनबी महसूस करते हैं जिसमें यथार्थ और मौजूदा सच्चाई से तालमेल करके ज़िन्दगी के निर्माण का सबक़ दिया गया हो। जिन लोगों की निगाह अपनी ज़िम्मेदारियों के बजाय अपने अधिकारों पर हो, वे ऐसी किसी दावत को ग़ैरज़रूरी समझ कर रद्द कर देते हैं जिसमें उन्हें उनकी ज़िम्मेदारियां याद दिलाई जाएं। जो लोग अपने बारे में यह समझ लें कि वे माफ़ किये हुए लोग हैं वे ऐसे पैग़ाम की सार्थकता को समझ नहीं पाते, जिसमें अपनी मौजूदा हालत के तहत उन्हें अपनी माफ़ी संदिग्ध दिखाई पड़ती हो। जिन लोगों ने ख़्यालों की रंगीन दुनिया में अपने क़िले बना रखे हों वे किसी ऐसे पैग़ाम को अहमियत देने में नाकाम रहते हैं, जिसको मानने की हालत में उन्हें दिखाई दे कि वे किसी सुरक्षित क़िले में नहीं बल्कि रेगिस्तान में खड़े हुए हैं। जिन लोगों ने यह आस्था बना रखी हो कि किसी अमल के बिना उनके लिए पहले से ही जन्नत के महल रिज़र्व हो चुके हैं वे किसी ऐसी तहरीक में हिस्सा लेना ग़ैरज़रूरी समझते हैं जिसमें अमल की बुनियाद पर जन्नत में दाखिले का राज़ बताया गया हो। सच को क़बूल करने में सबसे बड़ी रुकावट बिगड़ा हुआ मिज़ाज है। जो लोग बिगड़े हुए मिज़ाज वाले हों, उनको सिर्फ़ अपने मिज़ाज के मुताबिक़ बात ही अपील करती है। दूसरी कोई बात, चाहे वह कितनी ही दलीलों के साथ बयान कर दी जाए वह किसी तरह उन्हें अपील नहीं करती। अपने ख़ास मिज़ाज के ख़िलाफ़ किसी बात को मानना उनके लिए उतना ही कठिन हो जाता है, जितना कि बकरी के लिए गोश्त खाना और शेर के लिए घास चरना। वह नेकी नेकी नहीं जिससे फ़ख़्र और बड़ाई का जज़्बा पैदा हो
‹ Previous page Next page › Contents of January 2023 All issues