अजीब करिश्मा
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۴، صفحہ ۸
का तरफ़ बढ़ रहा है। हर आदमी का हाथ खुशियों के गुलदस्ते पर है। पर सच्चाई उसकी उम्मीदों के विपरीत है। जिस चीज़ को आदमी गुलदस्ता समझ कर वसूलकर रहा है वह उसके लिए विनाश का बम है। इसके अपवाद सिर्फ़ वे लोग हैं, जिनको मौत से पहले अपने रब का बोध हासिल हो गया, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी को सृष्टि के पालनहार के आज्ञापालन में गुज़ारा, जिनको मौत इस हाल में आई कि वे अपने इम्तिहान के पर्चे को कामयाबी के साथ हल कर चुके थे। जंग नहीं टाइम्स ऑफ़ इंडिया (4 दिसम्बर 1989) ने एक सार्वभौमिक आकलन शुरू किया था। इसमें बताया गया कि आज दुनिया के कूटनीतिक किस अन्दाज़ में सोचते हैं। इसमें बिल्कुल दुरुस्त तौर पर आधुनिक ज़ेहन की नुमाइन्दगी करते हुए कहा गया कि विश्व शक्ति या समाजी तब्दीली के लिए जंग के हथियार का इस्तेमाल अब एक नामुमकिन चीज़ बन चुका है। मौजूदा ज़माने में ऐसे बहुत से सबब सामने आए हैं, जिन्होंने जंग के तरीके को एक नामुमकिन तरीक़ा बना दिया है। आज कोई क्रौम जंग करके वह फ़ायदा हासिल नहीं कर सकती, जो पुराने ज़माने में शासक वर्ग इससे हासिल किया करता था।
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