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الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۱
इन्सान भी अपनी ला क़्रायनात (सृष्टि) निवावाद (सहज) रूप से विभिन्न और परस्पर विरोधी तत्वों का संकलन है। इसमें आग भी है और पानी भी। इसमें नाज़ुक पौधे भी हैं और सख़्त पत्थर भी। इसमें दिन की रोशनी भी है और रात का अंधेरा भी। लेकिन इन तमाम विरोधाभासों के बावजूद पूरी क़्रायनात एक सुव्यवस्थित इकाई की तरह काम करती है। जैसे यह एक ईश्वरीय माडल है। इन्सान को चाहिए कि वह भी इसी माडल को अपने लिए मार्गदर्शक बना ले। कुरआन के अध्ययन से पता चलता है कि इन्सान और बाक़ी क़्रायनात दोनों एक ही इकाई के दो हिस्से हैं। दोनों में जो फ़र्क़ है वह यह है कि इन्सान अपना निजी विवेक और निजी इरादा रखता है। जबकि क़्रायनात की अन्य चीजें़ निजी विवेक (शऊर) और निजी इरादा नहीं रखतीं। जड़ पदार्थ प्राकृतिक नियम (law of nature) से कंट्रोल होते हैं और जीवित चीजें़ अपने अन्दर छुपी हुई प्रेरणा या सहज-बोध (Instinct) से। कुरआन के अनुसार, क़्रायनात का जो धर्म (कार्य-पद्धति या निज़ामें-अमल) है, वही इन्सान का धर्म (दीन) भी है। दोनों की कामयाबी का रहस्य एक ही प्राकृतिक नक्शे (समीकरण) में छुपा हुआ है। कुरआन में कहा गया है: "क्या वे अल्लाह के दीन के सिवा कोई और दीन चाहते हैं, हालांकि उसी के वश में है वह सब कुछ जो ज़मीन और आसमान में है, ख़ुशी से या नाख़ुशी से।" कुरआन में दूसरी जगह कहा गया है: "ज़मीन में फ़साद न करो उसकी दुरुस्ती (या संशुद्धि) के बाद।" इससे पता चलता है कि जिस ज़मीन पर इन्सानों को बसाया गया