इबादत
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۵
इन दोनों पहलुओं से इन्सान की तरकाब ऐसा है कि जिस वह ख़ुदा की इबादत के लिए ही पैदा किया गया है। इबादत का सबसे कामिल रूप नमाज़ है। इस आयत की रोशनी में नमाज़ और इन्सानी शख़्सियत का जायज़ा लीजिए। इन्सान की मानसिक रचना का जायज़ा बताता है कि इन्सान ठीक अपनी रचना के लिहाज़ से यह चाहता है कि कोई हो, जिसके आगे वह अपने आपको झुका दे। यही वजह है कि ज़्यादातर इन्सान किसी न किसी के आगे अपने आपको झुकाए हुए हैं, और इस झुकाव से उन्हें ख़ास संतुष्टि हासिल होती है। मगर ग़ैर-ख़ुदा के आगे झुकना इस जज़्बे का ग़लत इस्तेमाल है। इस तरह आदमी ग़ैर-ख़ुदा को वह चीज़ दे देता है जो उसे सिर्फ़ ख़ुदा को देनी चाहिए। नमाज़ में जब आदमी ख़ुदा के आगे झुकता है तो उसको अपने इस जज़्बे की पूरी तस्कीन (तुष्टि) हासिल होती है। नमाज़ में ख़ुदा के आगे झुक कर वह अपने वजूद के उस पूरे तकाज़े का जवाब पा लेता है, जो उसके अन्दर रचा-बसा हुआ था कि वह उसको निकालना चाहे तब भी वह उसको निकाल न सके। यह एक हक़ीक़त है कि इन्सान के स्वाभाविक जज़्बे का मर्जअ (पनाहगाह) हक़ीक़त में ख़ुदा के सिवा और कोई नहीं हो सकता। इसके बाद इन्सान के जिस्म को लीजिए। आप किसी आदमी को नमाज़ पढ़ते हुए शुरू से आख़िर तक देखें। आप महसूस करेंगे कि नमाज़ आदमी के पूरे जिस्म का मुकम्मल इस्तेमाल है। आपको ऐसा मालूम होगा जैसे आदमी इसीलिए बनाया गया है कि वह नमाज़ पढ़े।