Al-Risala · May 2023 · page 9

इबादत

الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۹

रोज़ा स्पिरिट: रोज़ा का ज़ाहिरी सूरत रमज़ान के महान का रोज़ा हो और इसका अस्ल स्पिरिट सब्र है। रोज़े का मक़सद यह है कि आदमी के अंदर सब्र की स्पिरिट पैदा हो। जो आदमी रोज़ा रखता है उसके अंदर यह मिज़ाज पैदा हो जाता है कि वह नाख़ुशगवार बातों को बर्दाश्त करे, शिकायत करने के बजाय नज़र अंदाज़ करते हुए ज़िन्दगी गुज़ारे। जो लोग इस्लाम के इन पांच अरकान को महज़ उनकी शक्ल के लिहाज़ से इख़्तियार करें, वे महज़ शक्ल की हद तक तो उनको अपनाएंगे, लेकिन इन शक्लों के बाहर उनकी जिंदगी इन अरकान से बिल्कुल आज़ाद और असंबद्ध होगी। मसलन, वे ईमान के कलिमे के शब्दों को अपनी ज़ुबान से दोहराएंगे, पर उन ख़ास शब्दों के बाहर उनके सामने कोई सच्चाई आएगी तो वे उसको स्वीकार न कर सकेंगे। क्योंकि उनकी रूह कलिमे की स्पिरिट से ख़ाली है। वे नमाज़ की शक्ल को मस्जिद में खड़े होकर दोहराएंगे, लेकिन मस्जिद के बाहर लोगों के साथ उनका वास्ता पड़ेगा तो वहां वे विनम्रता का अंदाज़ अपना न सकेंगे और इसकी वजह यह होगी कि नमाज़ की जो स्पिरिट है वह उनके अंदर मौजूद नहीं। इसी तरह वह ज़कात के नाम पर एक रकम निकाल कर किसी को दे देंगे, पर इसके बाद जब लोगों के साथ मामला करेंगे तो उसमें वे खैरख्वाही का सबूत न दे सकेंगे, क्योंकि ज़कात स्पिरिट से उनका सीना खाली था। वे पूरे सम्मान से हज का सफर करेंगे और उसके मरासिम अदा करके वापस आ जाएंगे पर वे इसके लिए तैयार न होंगे कि लोगों की तरफ़ से पेश आने वाली शिकायतों को नज़रअंदाज़ करते हुए उनके साथ मेल-मिलाप और एकता का बर्ताव करें। क्योंकि उन्होंने हज के बावजूद

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