तक़वा और शुक़
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۰
वह इस बात का पात्र हो गया कि दुनिया में उसका अल्लाह का रहमत मिले और आख़िरत में उसको जन्नत में दाख़िल किया जाए। लेकिन इस्लाम के पांच अरकान अपनी शक्ल और रूह दोनों के लिहाज़ से होने चाहिए। उनके अदा होने पर जिन इनामों का वादा है उसका ताल्लुक़ पूरी अदाएगी पर है न कि अधूरी अदाएगी पर।
तक़वा और शुक़
हज़रत अबू उमामा कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि मेरे रब ने मेरे सामने यह पेशकश की कि मक्का की घाटी को तुम्हारे लिए सोना बना दिया जाए। मैंने कहा कि मेरे रब, नहीं बल्कि मुझे यह पसंद है कि मैं एक दिन खाऊं और एक दिन भूखा रहूं। बस जब मुझे भूख लगे तो मैं तेरी तरफ़बेबसी ज़ाहिर करूं और तुझको याद करूं और जब मुझे सेरी (तृप्ति) हासिल हो तो मैं तेरी तारीफ़ करूं और तेरा शुक्र अदा करूं। अल्लाह तआला अपने बन्दों से दो चीजें चाहता है। एक यह कि वह अल्लाह की कुदरत को स्वीकार करके उसके आगे अपने इज्ज़ (बेबसी), विनम्रता का इज़हार करें। दूसरे यह कि वह अल्लाह की नेमतों को महसूस करके उस पर शुक्र करने वाले बन जाएं। ये दोनों बातें निहायत साफ़ तौर पर कुरआन और हदीस में बताई गई हैं। मगर इसका सबसे बड़ा अमली तजुर्बा वह है जो भूख और तृप्ति की सूरत में इन्सान के साथ पेश आता है। जब आदमी को भूख लगती है, जब उसको प्यास लगती है, उस वक़्त उसको आख़िरी हद तक इस हक़ीक़त का एहसास होता है कि वह कितना