तक़वा और शुक़
الرسالہ، مئی ۲۰۲۳، صفحہ ۱۲
के लिए रमज़ान के महीने को रोज़ा मुक़र्रर किया गया हो रमज़ान का रोज़ा गया अमूमी (सामान्य) तरबियत का ख़ुसूसी (विशेष) कोर्स है। चुप रहिए कुरआन में है कि कान और आँख और दिल, हर चीज़ के बारे में इन्सान से पूछ होगी (बनी इस्राईल 36)। हदीस में आया है कि तुम में जो शख़्स फ़तवा देने में ज़्यादा जरी (दुस्साहसी) है वह जहन्नम के ऊपर ज़्यादा जरी है। इसलिए फ़तवा देने के मामले में सहाबी बेहद एहतियात बरतते थे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद के बारे में हदीस में आया है कि अब्दुल्लाह तराज़ू में उहुद पहाड़ से भी ज़्यादा वज़नी हैं। इसके बावजूद उनका यह हाल था कि वह कूफ़ा में थे। उन से एक मामले में पूछा गया तो उन्होंने जवाब नहीं दिया। लोग उनसे महीने भर पूछते रहे। यहां तक कहा कि अगर आप ही फ़तवा न देंगे तो हम किस से पूछें? फिर भी उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर हमेशा फ़तवा देने से परहेज़ करते थे। लोग जब ज़ोर डालते तो कहते कि हमारी पीठ को जहन्नम के लिए सवारी न बनाओ। इन रिवायतों में फ़त्वे से मुराद कोई सीमित फ़तवा नहीं है। इसका तअल्लुक़ उन तमाम बातों से है जो मुसलमानों के साथ होती हैं और जिनमें वे अपने आलिमों और अपने रहनुमाओं से राय पूछते हैं। ऐसे मामलों में आलिमों और रहनुमाओं का फ़र्ज़ है कि वे बोलने से ज़्यादा सोचें। वे उस वक़्त तक कोई बयान न दें जब तक इस मामले में मश्वरा, और ग़ौरो-फ़िक्र की तमाम शर्तों को आख़िरी हद तक पूरा न कर चुके हों। ऐसे मामलों में न बोलना इससे बेहतर है कि आदमी ग़ैरज़िम्मेदाराना तौर पर बोलने लगे।