Al-Risala · July 2024 · page 1

ایک رجل سعید کا انتقال

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۴، صفحہ ۱

उन्हान जाश भर अन्दाज़ से कहा: जब बिड़ला मन्दिर में नमाज़ होगा और जामा मस्जिद में आरती लगाई जाएगी, तब कुछ बात बनेगी। यह किसी एक आदमी की बात नहीं। इस मुल्क में बहुत से लोग इसी अन्दाज़ में सोचते हैं। उनका ख़याल है कि हिन्दूओं और मुसलमानों में फ़िरक़ावाराना भाईचारा लाने का राज़ सिर्फ़ यह है कि दोनों मज़हबों का फ़र्क़ मिटा दिया जाए। दोनों को मिला कर एक मज़हब जैसा बना दिया जाए। इस तरह का मिश्रण सरासर नामुमकिन है। और जो चीज़ नामुमकिन हो वह कभी किसी मसले का हल नहीं बन सकती। हल वह है जो मुमकिन हो, क़ाबिले-अमल यानी व्यावहारिक हो। हक़ीक़त यह है कि दोनों मज़हबों में तालमेल पैदा करने का एकमात्र राज़ रवदारी (tolerance) है। रवदारी ही के ज़रिए इससे पहले दोनों फ़्रिकें मेल- मिलाप से रहते थे। इसी के ज़रिए आज भी बहुत से मुल्कों में अगल-अलग मज़हब के लोग मिल-जुल कर ज़िन्दगी गुज़ारते हैं। और इसी के ज़रिए से हिन्दुस्तान में भी दोबारा साम्प्रदायिक भाईचारा लाया जा सकता है। अमरीका और कनाडा में कोई यहूदी चर्च के अन्दर अपनी इबादत नहीं करता, इसी तरह वहां कोई ईसाई सेनेगाग में जाकर अपना इबादती अमल अंजाम नहीं देता। वहां हिन्दू भी हैं और मुस्लिम भी। मगर कभी ऐसा नहीं होता कि हिन्दू मस्जिद के अन्दर अपनी पूजा कर लें और मुसलमान मन्दिर के अन्दर

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