Al-Risala · November 2024 · page 2

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الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۲

मन जो कुछ किया, ऐ अल्लाह, अगर वह हिदायत है तो उसका तस्दाक़ मेरे दिल में डाल दे। वरना मैं जिस में पड़ गया हूं उससे मेरे लिए निकलने की सूरत पैदा कर दे (सीरत इब्ने कसीर, पहला भाग, पेज 446)। इसी के साथ अगले दिन वह रसूलुल्लाह (स.अ.व.) से मिले। उन्होंने आप से कहा कि मेरे भतीजे, मैं एक मामले में पड़ गया हूं। और उससे निकलने की सूरत मुझे नज़र नहीं आती। मुझे यह भी नहीं मामूल कि यह सही रास्ता है या गुमराहही है। इसलिए आप इस मामले में मुझे बताइए। ऐ भतीजे, मैं तुमसे इस मामले में सुनना चाहता हूं। रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने उनको नसीहत की। उन्हें ख़ौफ़ दिलाया और उनको अल्लाह के इनाम की खु़शख़बरी दी। इसके बाद अल्लाह ने उनके दिल में यक़ीन डाल दिया। उन्होंने कहा कि मैं गवाही देता हूं कि आप सच्चे हैं। ऐ मेरे भतीजे, अपने दीन का आम ऐलान करो। ख़ुदा की क़सम, अगर मुझे वह सब कुछ दिया जाए जिस पर आसमान ने साया किया है, तब भी मैं इस दीन को नहीं छोडूंगा (पेज 446)। इसके बाद हज़रत हम्ज़ा पूरी तरह आप के साथी बन गए। जाहिलियत (इस्लाम से पहले) के ज़माने में वह एक दौलतमन्द शख़्स थे। इस्लाम में आने के बाद उनकी दौलत ख़त्म हो गई। उन्हें अपने वतन मक्का को छोड़ कर मदीना जाना पड़ा। इस्लाम की ख़ातिर उन्हें अपनी क़ौम से लड़ाई लड़नी पड़ी। फिर भी आख़िर तक वह पूरी वफ़ादारी के साथ रसूलुल्लाह (स.अ.व.) के साथ रहे। यहां तक कि उहुद की जंग में वह शहीद हो गए। यह वह बड़ी खु़शक़िस्मती है जो हज़रत हम्ज़ा को हासिल हुई। फिर भी यह सौभाग्य

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