Al-Risala · November 2024 · page 3

बोलने का तरीक़ा

الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۳

दिल से उस स्वीकार किया, बल्कि हर नुक़सान और मुसाबता को बर्दाश्त करते हुए बराबर उस पर क़ायम रहे। यह है हज़रत हम्ज़ा की वह कुर्बानी, जिसके नतीजे में सारी दुनिया के मुसलमान हर हफ़्ते जुमा' के खुुतबे में 'सैयदशुशुहदा हम्ज़ा' कह कर उनकी दीनी बढ़ाई का एतिराफ़ करते हैं।

बोलने का तरीक़ा

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का बोलने का तरीक़ा यह था कि आप हमेशा साफ़ अन्दाज़ में बोलते थे और अल्फ़ाज़ को ठहर-ठहर कर अदा करते थे। आपकी अहलिया हज़रत आयशा रज़ी अल्लाहू अन्हा ने बाद के ज़माने के लोगों से फरमाया: रसूलुल्लाह (स.अ.व.) तुम लोगों की तरह तेज़-तेज़ नहीं बोलते थे, बल्कि आपके कलाम में ठहराव होता था। आप के पास बैठा हुआ आदमी उसको याद कर लेता था (सुनन अल-तिरमिधि, हदीस संख्या 3639)। एक और रियायत में ये अल्फ़ाज़ आए हैं:

रसूलुल्लाह (स.अ.व.) इस तरह तेज़-तेज़ बातें नहीं करते थे जैसे तुम करते हो, आप इस तरह बात करते थे कि अगर गिनने वाला गिने तो उसको गिन ले। (सही अल-बुख़ारी, हदीस न. 3567)

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