मेयार को बुलन्द करना
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۸
जबकि मुठभड़ के सिवा कोई और सूरत बाक़ी न रह गई हो। एसा बाक़ायदा जग सिर्फ़ तीन हैं जिनमें आप ख़ुद शरीक रहे हों (बद्र, उहुद और हुनैन)। आपके ज़माने में मू'ता की जंग भी हुई मगर उसमें आप ख़ुद शामिल न थे। आपको अरब में जो ताक़त हासिल हुई वह जंग के ज़रिए नहीं हुई। बल्कि उस सुलह के ज़रिए हुई, जिसको कुरआन में फ़तह-मुबीन (48:1) यानी खुली-जीत कहा गया है। सुलह-हुदैबिया का वाक़िआ ग़ैर-ख़ूनी इन्किलाब लाने के लिए अपने आपका ख़ून करने से कम न था। आपने अपनी ज़ात का 'ख़ून' करना गवारा किया ताकि बाहर की दुनिया में ख़ून न बहाया जाए। पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.व.) को अरब में जो ताक़त हासिल हुई वह जंग के ज़रिए नहीं बल्कि दावत के ज़रिए हासिल हुई। इसी दावत के बन्द दरवाज़ों को खोलने के लिए आपने यह किया कि दुश्मन से उसकी अपनी शर्तों पर सुलह कर ली। यह सुलह हुदैबिया थी जिसको कुरआन में खु खुली फ़तह कहा गया है। सुलह हुदैबिया इस बात का एक ऐतिहासिक सबूत है कि जंग के मुक़ाबले में अमन की ताक़त बहुत ज़्यादा है। रसूलुल्लाह (स.अ.व.) ने हुदैबिया की एकतरफ़ा सुलह के ज़रिए इसी महान हक़ीक़त का अमली रूप दिखाया है, फिर भी यह कोई सादा बात नहीं। इस क़िस्म की एक घटना को अमली रूप देने के लिए सब्र की ज़रूरत है, और इस दुनिया में बेशक सब्र से ज़्यादा मुश्किल कुरबानी और कोई नहीं।
मेयार को बुलन्द करना
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