बोलने की सूझबूझ
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۷
हा और यहाँ वह क़ीमत है जिसके दिन के लिए कोई शर्क्स तैयार नही खूनी इन्क़िलाब टकराव की ज़मीन पर आते हैं और ग़ैर-खूनी इन्क़िलाब सब्र और संयम की ज़मीन पर और सब्र से ज़्यादा मुश्किल कोई काम इस दुनिया में एक इन्सान के लिए नहीं। सब्र की हक़ीक़त झटके को अपने पर लेना है, दूसरे पर डालने के बजाए अपने आप पर सहना है। हक़ीक़त यह है कि लड़ाई के बग़ैर भी जीत होती है। मगर लड़ाई के बग़ैर जीतने के लिए अपने आप से लड़ना पड़ता है। लोग अपने आप से लड़ नहीं पाते, इसलिए वे लड़ाई के बग़ैर लड़ाई जीतने वाले भी नहीं बनते। मुहम्मद (स.अ.व.) ग़ैर-खूनी इन्क़िलाब लाने में किस तरह कमियाब हुए, इसका अन्दाज़ा आपकी ज़िन्दगी के हालात को पढ़ने से होता है। मक्का में 13 साल तक आपके विरोधियों ने आपको और आपके साथियों को हर तरह की तकलीफ़े पहुंचाईं। उन्होंने अल्फ़ाज़ की चोट भी दी और पत्थर और तलवार की चोट भी। मगर इस तरह की बेशुमार घटनाओ के बावजूद मुहम्मद (स.अ.व.) ने एक बार भी जवाबी प्रतिक्रिया नहीं की। न किसी से कोई लड़ाई की। आप विरोधियों के हर वार को एकतरफ़ा तौर पर सहते रहे। उनकी तरफ़ से हर क़िस्म के भड़काव के बावजूद कभी भड़के नहीं। इसके बाद आपने यह किया कि मक्का को छोड़ कर ख़ामोशी के साथ मदीना चले गए। आपने न इसके ख़िलाफ़ फ़रियाद की कि आपको आपके साथियों को अपने वतन और अपनी जायदाद को छोड़ना पड़ रहा है और न इसकी परवा की कि इस तरह वतन छोड़ कर जाने की वजह से लोग आप पर बुज़दिली और फ़रार का इलज़ाम लगाएंगे।
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