Al-Risala · November 2024 · page 15

अल्लाह की याद तमाम आमाल का ख़ूलासा है

الرسالہ، نومبر ۲۰۲۴، صفحہ ۱۵

गुमनामी में पड़े हुए हीर निखर उठें और झूठी शोहरत का लबादा ओढ़ने वाले लोग बेनक़ाब हो जाएं। और यह कि जब रसूलुल्लाह (स.अ.व.) और आपका चिन्तन माहौल में छा जाए तो इस तरह छाए कि वह उनका एक साबितशुदा हक़ बन चुका हो, और इसी तरह जब आपके विरोधियों को नाकाम किया जाए तो यह नाकामी इस तरह आए कि वह लोगों को एक खुली हुई ऐतिहासिक ज़रूरत दिखाई देने लगे। मुश्किल में आसानी का यह तजुर्बा जो रसूलुल्लाह (स.अ.व.) को हुआ, यही आइन्दा भी आपके उम्मतियों को होता रहेगा, बशर्ते कि वे उसी सही रास्ते पर चलें, जिस पर आप चले और उसी सब्र और धीरज का सबूत दें जिसका सबूत आपने अपने ज़माने में दिया।

अल्लाह की याद तमाम आमाल का ख़ूलासा है

हज़रत अबूदर्दार्' से روایت है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमायाः क्या मैं तुमको न बताऊं कि कौन सा अमल (कर्म) सबसे बेहतर है, और तुम्हारे आक़ा के नज़दीक सबसे पाकीज़ा (पवित्र) है और तुम्हारे दर्जे को बढ़ाने वाला है और तुम्हारे लिए सोने-चांदी के इन्फ़ाक़ (बहुलता, प्रचुरता) से बेहतर है और तुम्हारे लिए इससे बेहतर है कि तुम अपने दुश्मन से मुठभेड करो और तुम उनकी गर्दनें मारो और वे तुम्हारी गर्दनें मारें? सहाबा ने कहा, हां ऐ खुदा के रसूल। आपने फ़रमायाः

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