ایک سوال
الرسالہ، مئی ۲۰۲۵، صفحہ ۱
अहमियत पता चलता है। वास्तव में, इस्लाम के सभा काया में शुक्र हो एक ऐसा कार्य है जिसे इंसान अपनी क्षमता के अनुसार सबसे ऊँचे दर्जे में कर सकता है। अन्य कार्यों जैसे इबादत, अखलाक़ और लेन-देन में कुछ न कुछ कमी रह सकती है, लेकिन शुक्र दिल और दिमाग से जुड़ा हुआ है, और दिल व दिमाग से जुड़े हुए कार्यों में यह संभव है कि इंसान उसे पूर्ण रूप में अदा कर सके। यहाँ वह अपने सारे जज़्बात और अपनी सारी सोच को ख़ुदा के सामने पेश कर सकता है। यह विशेषता केवल शुक्र को हासिल है। शुक्र क्या है? शुक्र असल में एतराफ़ (स्वीकृति) का दूसरा नाम है। इंसानी मामलों में जिसे एतराफ़ कहते हैं, वही ख़ुदाई मामले में शुक्र है। हर इंसान के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपने शऊर (conscious) को इतना ज़्यादा जागृत करे कि उसे मिलने वाली हर चीज़ सही मायनों में ख़ुदा की कृपा दिखाई दे। वह पूर्ण एतराफ़ के जज़्बे के साथ यह कह सके, "ऐ ख़ुदा, तेरा शुक्र है।" ख़ुदा की नेमतों और रहमतों का पूर्ण एहसास करके यह कहना कि "सारी तारीफें अल्लाह के लिए हैं जो तमाम जहानों का पालनहार है" यही शुक्र है और यह शुक्र निस्संदेह सबसे बड़ी इबादत है। मौजूदा दुनिया में वह चीज़ बहुत बड़े पैमाने पर मौजूद है जिसे लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम कहा जाता है। यहाँ की हर चीज़ इस तरह बनाई गई है कि वह इंसान के लिए पूरी तरह अनुकूल हो। ऐसी स्थिति में इंसान को चाहिए कि जब वह इस