आसान विकल्प का चयन—एक सुन्नत
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۵، صفحہ ۶
विकल्प है, वह कभी भी कोई मनचाहा विकल्प नहीं हो सकता। पैग़म्बर इस्लाम की ज़िन्दगी के घटनाएँ स्पष्ट रूप से इस दृष्टिकोण की पुष्टि करती हैं। पैग़म्बर इस्लाम ने 610 ईस्वी में मक्का में तौहीद के मिशन की शुरूआत की। उस समय मक्का शिर्क का केंद्र बना हुआ था। चूँकि वहाँ के बहु-ईश्वर में विश्वास करने वाले आपके दुश्मन बन गए, फिर भी आपका मिशन फैलता रहा और लोग आपके साथी बनते रहे। इस प्रकार तेरह साल गुज़र गए। अब मक्का के विरोधियों ने यह निर्णय लिया कि वे आपको मार डालेंगे। यह 622 ईस्वी का घटना है। उस समय आपको दो में से एक के चयन का अवसर था। एक यह कि मक्का के सरदारों की युद्धकालीन चुनौती को स्वीकार करते हुए, उनसे सशस्त्र मुकाबला करें। उस समय तक मक्का और उसके आस-पास के इलाकों में कई सौ लोग आपके ऊपर ईमान लाकर आपके साथी बन चुके थे, इस दृष्टि से यह विकल्प आपके लिए एक संभावित विकल्प था। आपके लिए दूसरा विकल्प यह था कि आप सशस्त्र संघर्ष से परहेज करें, चाहे इसके लिए आपको मक्का से हिजरत (पलायन) करनी पड़े, यानी आप शांतिपूर्वक मक्का छोड़कर चले जाएं, आपने यही दूसरा तरीका अपनाया। आपने सशस्त्र संघर्ष का तरीका छोड़ दिया और शांतिपूर्ण हिजरत का तरीका अपनाकर आप मदीना चले गए। हालांकि आम लोगों की नज़र में यह कोई सम्मानजनक तरीका नहीं था। चूँकि धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों ने इस घटना को हिजरत के बजाय 'फरार' (flight) का नाम दिया है।
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