जीवन के उस पार
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۵، صفحہ ۷
(negotiation) का सिलसिला शुरू किया। इस बातचीत का उद्देश्य यह था कि आप और मक्का वालों के बीच शांति का समझौता हो जाए। यह बातचीत, हुदैबिया के स्थान पर दो हफ्ते तक जारी रही। इस बातचीत के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि दूसरे पक्ष अपनी एकतरफा शर्तों पर अडिग था। वे लोग इस मामले में किसी भी प्रकार से झुकने के लिए तैयार नहीं हुए। आखिरकार, पैग़ाम्बर इस्लाम ने कुरैश के सरदारों की एकतरफा शर्तों को मान लिया, ताकि दोनों पक्षों के बीच शांति कायम हो सके। इस प्रकार सुल्ल्हे हुदैबिया संपन्न हुई, जो दरअसल आपके और दूसरे पक्ष के बीच दस साल का ना-जंग समझौता (no-war pact) था। इस घटना के माध्यम से पैग़ाम्बर इस्लाम ने उम्मत को यह उदाहरण दिया कि सशस्त्र संघर्ष का चयन किसी भी स्थिति में नहीं करना है, कोई भी कीमत चुकाकर हर हाल में शांति कायम रखनी है— इस्लाम में शांति की स्थिति सामान्य है और युद्ध की स्थिति केवल अपवाद है। (विस्तार के लिए कृपया देखें लेखक की किताबें— "मुताला-ए-सीरत", और "अमन-ए-आलम", आदि)
जीवन के उस पार
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