Al-Risala · July 2025 · page 12

जीवन के उस पार

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۵، صفحہ ۱۲

तुम पर ऐसा दिन आएगा जिसका अज़ाब (दंड) सबका अपन घर म ले लेगा।" (सूरह हूद, 11:84)

यह पैग़ाम हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम का था, जो उन्होंने लगभग साढ़े तीन हज़ार साल पहले मद्यन की क़ौम को दिया। मद्यन, प्राचीन अरब में बहर-ए-अहमर (Red Sea) के किनारे बसा हुआ एक शहर था। हज़रत इब्राहिम (1985-2160 क़बल मसीह) की बीवी क़तूरा से उनके एक बेटे पैदा हुए जिनका नाम मद्यन था। उन्हीं की संतान यहाँ आबाद हुई, और उन्हीं के नाम पर इस शहर को "मद्यन" कहा गया। इन्हीं में हज़रत इब्राहिम के लगभग 5 सौ साल बाद हज़रत शुऐब पैदा हुए। उस समय तक मद्यन की क़ौम में काफी बिगाड़ आ चुका था। अल्लाह तआला ने हज़रत शुऐब को नबूवत अता की और उन्हें हुक्म दिया कि वे हज़रत इब्राहिम की इस बिगड़ी हुई औलाद को हक़ का पैग़ाम सुनाएँ। अब यह सवाल पैदा होता है कि मद्यन की क़ौम में कौन सी बुराई थी जिस की वजह से उन्हें यह चेतावनी दी गई कि "अपने आज के अच्छे हालात पर मत इतराओ, आने वाले समय में सख़्त अज़ाब आ सकता है"? क़ुरआन के मुताबिक़, उनकी बुनियादी बुराई यह थी कि वे नाप-तौल में धोखाधड़ी करते थे, यानी जब खुद कुछ लेते तो पूरा-पूरा लेते और जब दूसरों को देते तो उसमें कमी कर देते। (7:85)

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