जीवन के उस पार
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۵، صفحہ ۱۵
और बीमार माँ, जिन्हे दिल्ली लाने वाला ये उम्मीद था कि उसका दामाद यहाँ रिक्शा चलाकर अपना रोज़गार कर रहा है। ज़ाहिर है कि रिक्शा चलाने वाला एक आदमी दो परिवारों का गुज़ारा कैसे कर सकता था। शरीफ़ को रोज़गार तलाशना पड़ा। शुरू में कुछ दिन वह एक मामूली होटल में बर्तन धोने का काम करता रहा। इसके बाद एक संपन्न मुस्लिम परिवार में उसे घरेलू कामों के लिए पचास रुपये माहवार पर जगह मिल गई। शरीफ़ एक अत्यंत ग़रीब परिवार का लड़का था। इस दुनिया में आँख खोलने के बाद उसे जो बिस्तर मिला वह ज़मीन पर बिछा हुआ एक टाट था। अब तक की ज़िंदगी उसने इस तरह गुज़ारी कि न तो कभी उसके पैरों में जूता पड़ा और न ही उसके शरीर पर कभी पूरा कपड़ा आया। सर्दियों की रातों का मतलब उसके लिए बस इतना था कि लकड़ी के टुकड़े और सूखी पत्तियाँ जमा करके कुछ देर आग और धुएँ के सहारे गुज़ारा किया जाए, और फिर एक फटा हुआ टाट नीचे बिछा लिया जाए और दूसरा फटा हुआ टाट ऊपर ओढ़ लिया जाए। दिसंबर की एक सुबह की बात है, जब शरीफ़ मकान मालकिन का बिस्तर समेट रहा था। अचानक एक ख़याल उसके ज़हन में रेंगा। मसहरी पर बिछा हुआ मोटा और मुलायम गद्दा, उसके ऊपर सुंदर चादर और मखमली कपड़े से बना हुआ शानदार लिहाफ़ – इन चीज़ों ने उसे थोड़ी देर के लिए स्तब्ध कर दिया। “आपा,” वह मालकिन की बेटी से बोला, “क्या अल्लाह मियाँ के यहाँ ऐसा बिस्तर होगा?”
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