Al-Risala · July 2025 · page 16

जीवन के उस पार

الرسالہ، جولائی ۲۰۲۵، صفحہ ۱۶

म डूबा हुआ नज़र आता है — छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या ग़रीब, पढ़-लिख हों या अनपढ़ — सभी लोग दुनिया की चमक-दमक पर टूटे पड़ते हैं। लज़्ज़त, दौलत, शोहरत, इज़्ज़त, रुतबा, इख़्तियार — यानी दुनिया की चीज़ों में से अगर किसी एक का छोटा-सा हिस्सा भी किसी के सामने आ जाए, तो वह उसकी ओर ऐसे दौड़ता है... मानो बिना बोले वो ये कह रहा हो कि — “अल्लाह के यहाँ भला ऐसी शानदार चीज़ें कहाँ मिलेंगी! तो फिर क्यों न इस दुनिया में जो कुछ भी हासिल हो सकता है, उसे ही हासिल कर लिया जाए।”

सबसे ज़्यादा अजीब बात यह है कि इस मामले में धार्मिक लोगों का हाल भी वही है जो अन्य दुनियादारों का है। आज के दौर में जो दुनियावी संभावनाएँ उनके लिए खुली हैं, उनकी तरफ़ दौड़ने में वे भी दूसरों से एक क़दम भी पीछे नहीं हैं। पदों और ओहदों की धूम, सदर और नाज़िम के सम्मान, जलसों और जुलूसों की दिखावट, अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंसों के लिए हवाई सफ़र, भाषण और स्वागत के तमाशे, अख़बारों की सुर्खियों में छपने की चाह और इसी तरह की दूसरी चीज़ों का शौक़ — उन्हें भी उतना ही है जितना किसी आम दुनियादार को हो सकता है।

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