एकता की मिसाल
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۶۱
विनम्रता के साथ लोगों के बीच रहा। अब यदि आपने आलोचना का जवाब विनम्रता से दिया, तो यह पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल होगा; लेकिन यदि आपने जवाब अहंकार और घमंड के साथ दिया, तो यह आपका अपनी इच्छाओं का पीछा करना कहलाएगा। एक व्यक्ति के किसी रवैए से आपको शिकायत पैदा हुई। आप उत्तेजित हो गए। उस वक़्त आपके सामने रसूल (सल्ल०) की लाई शरीअत का यह हुक्म आया कि लोग भड़काएं तब भी तुम सब्र और नज़रअन्दाज़ करने का तरीका अख़्तियार करो। अब अगर आपने उत्तेजना के बावजूद सब्र किया तो आपने पैग़म्बर के लाए हुए दीन पर अमल किया। और अगर आप उत्तेजित होकर उस व्यक्ति से लड़ने लगे तो आपने अपनी इच्छा की पैरवी की। यही मामला पूरी ज़िन्दगी का है। हर मामला जो आदमी के साथ घटता है, उसमें उसके लिए दो में से एक रवैया इख़्तियार करने का मौक़ा होता है। एक रवैया अपनाने के बाद वह ख़ुदा के यहां ईमान वाला लिख दिया जाता है और दूसरा रवैया इख़्तियार करने के बाद बे-ईमान।
एकता की मिसाल
एक व्यक्ति ने अपना एक अनुभव लिखा है कि एक मछुआरे ने एक बार मुझे
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