Al-Risala · November 2025 · page 62

एकता की मिसाल

الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۶۲

इसक उलट, बुरा बात वह है जो अपन अहंकार का बढ़ाْن, ज़ालिम का ताक़त देने या बुरी नीयत से कही जाए। ऐसी बातें दबे हुए झगड़ों को फिर भड़का देती हैं और आख़िरकार धरती पर फ़साद और अवव्यवस्था फैल जाती है। अल्लाह पर और आख़िरत पर यक़ीन आदमी को संजीदा और ज़िम्मेदार बनाता है। और जो शख़्स सच्चे अर्थों में संजीदा और ज़िम्मेदार हो जाए उसका बोलना वैसा ही हो जाएगा, जिसका उपरोक्त हदीस में ज़िक्र हुआ है। दो तरीक़े अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि अल्लाहु अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया: तुम में से कोई शख़्स ईमान वाला नहीं हो सकता यहां तक कि उसकी इच्छाएं उसके अधीन न हो जाएँ जिसे मैं लेकर आया हूँ। (अल-सुन्नह इब्ने आसिम, हदीस संख्या 15) इस हदीस से मालूम होता है कि दुनिया में अमल (कर्म) करने के दो तरीक़े हैं। एक है अपनी ख़्वाहिश पर अमल करना और दूसरा है पैगम्बर के लाए हुए दीन पर अमल करना। आपके सामने एक हक़ आया। आपके दिल ने गवाही दी कि यह हक़ (सत्य) है। लेकिन इसी के साथ चेतन या अवचेतन रूप से यह एहसास पैदा हुआ कि अगर

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