एकता की मिसाल
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۳
जानवर के लिए यह लम्हा सख़्त कष्टदायक होता है, पर वह एक एस दुश्मन के मुक़ाबले में अपने को बेबस पाता है जो खुद उसके पेट में घुसा हुआ हो। इस तरह लार्वा ज़ोर लगाता रहता है, यहां तक कि वह अपने मेज़बान जानवर के जिस्म को फाड़ कर बाहर आ जाता है। यह सारा कुछ इतना ज़्यादा कष्टदायक होता है कि इसके दौरान मेज़बान जानवर मर जाता है। क़ुदरत के सिखाए हुए जीव-जन्तुओं में बचाव के जो उपाय पाए जाते हैं, वही इन्सान के लिए भी पूरी तरह कारगर हैं। इन्सान के लिए भी अपने दुश्मन के मुक़ाबले में बेहतरीन तरीक़ा यह है कि वह सीधे टकराव से बचे और कतरा कर निकलने की कोशिश करे। दुश्मन को भी यह महसूस करने का मौक़ा न दिया जाए कि आप उसके 'दायरे' में प्रवेश कर रहे हैं। अगर दुश्मन का सामना हो जाए तो उसके मुक़ाबले में अपने को निष्क्रिय और बेजान जाहिर करके अपने को उसकी पकड़ से हटा लिया जाए, अपने दायरे में सिमट कर उसको यह अहसास दिलाया जाए कि मेरी वजह से तुम्हारा किसी किस्म का कोई नुकसान नहीं। इसी के साथ ऐसा उपाय भी किया जाए जिसके ज़रिए संकट की घड़ी में दुश्मन का वार ख़ाली जा सके। जानवरों ने अपने बचाव के ये उसूल खुद नहीं बनाए, वे उनको ख़ुदा ने सिखाए हैं। इनको ख़ुदाई पुष्टि हासिल है। फिर जानवरों की दुनिया में इस तरह के बचाव व सुरक्षा के तरीक़े 'बुज़दिली' की वजह से नहीं हैं, बल्कि ख़ालिस हक़ीक़त पसंदी (यथार्थवाद) पर आधारित हैं। इसका मतलब यह होता है कि ग़ैरज़रूरी
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