एकता की मिसाल
الرسالہ، نومبر ۲۰۲۵، صفحہ ۶۳
उसम मजबूरन पड़े जाए वह आत्म-विकास के काम का जारा रखन का ख़ातिर टकराव से बच कर निकल जाता है। जानवर तो ये तरीक़ा अपनी फितरत से अपनाते हैं, लेकिन इंसान को इसे अपनी समझ-बूझ से अपनाना पड़ता है। बोलने की शर्त अबू हरैरा रज़ि अल्लाहु अनु कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि जो आदमी अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर ईमान रखता हो उसको चाहिए कि वह बेहतर बोले वरना चुप रहे। (सहीह अल- बुख़ारी, हदीस संख्या 6019)
जो इंसान अल्लाह की बड़ाई, ताक़त और उसकी महानता को मानता है, और जिसे यक़ीन है कि क़यामत के दिन अल्लाह उसकी हर बात का हिसाब लेगा - वह बोलते समय बहुत संभलकर बोलता है। यह स्वभाव उसको अपने आप पर नज़र रखने वाला बना देता है। उसकी ज़ुबान पर ख़ामोशी का ताला लग जाता है। वह सिर्फ़ उस वक़्त बोलता है, जबकि बोलना वाक़ई ज़रूरी हो गया हो और जहां सच्ची ज़रूरत न हो वहां वह चुप रहना पसंद करता है। जो आदमी अपनी मानसिकता के स्तर पर ऐसा बन जाए, उसकी ज़बान जब
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