Al-Risala · January 2025 · page 5

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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۵

श्ख्श का नाक से टकरानि का हद शुरू हा वहा हाथ हिलान वाले का आज़ादी का हद भी ख़त्म हो जाती है। हक़ीक़तपसन्दी किसी ने कहा है, “अपने हक़ से ज़्यादा चाहना अपने आपको अपने वास्तविक हक़ से भी वंचित कर लेना है।” कोई आदमी जब उतना ही चाहे जिसका व सचमुच हक़दार है तो हर चीज़ उसकी मांग का समर्थन कर रही होती है। और जब वह अपने जाइज़ हक़ से ज़्यादा चाहने लगे तो हर चीज़ उसके ख़िलाफ़ हो जाती है। यही वजह है कि पहला आदमी हमेशा कामयाब होता है। और दूसरा आदमी हमेशा नाकाम। एक बड़ा संस्थान था, उसमें एक मैनेजर की ज़रूरत थी। एक आदमी के अन्दर मैनेजमेंट की सलाहियत थी। उसको वहां मैनेजर की हैसियत से रख लिया गया। संस्थान के डायरेक्टर ने मैनेजर के साथ काफ़ी रियायत का बर्ताव किया। अच्छी तन्ख़वाह, रहने के लिए मकान, आने-जाने के लिए एक जीप और दूसरी कई चीज़े उन्हें हासिल हो गईं। मगर कुछ दिनों के बाद उस आदमी के मन में ज़्यादा की चाह पैदा हो गई। 'मैनेजर' की हैसियत उसको कम लगी। उसने चाहा कि डायरेक्टर की सीट पर क़ब्ज़ा कर ले। अब मैनेजर ने चुपके-चुपके डायरेक्टर के ख़िलाफ़ मंसूबा बनाया। मगर मंसूबे की कामयाबी से पहले डायरेक्टर को उसकी ख़बर हो गई। उसने चटपट कार्रवाई करके उस आदमी को मैनेजर की पोस्ट से हटा दिया। मकान

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