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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۶
तराक़ी इख़्तियार करता तो वह न सिर्फ़ कामयाब रहता, बल्कि और भी तरक़्क़ी करता। मगर ‘हिर्स’ का तरीक़ा इख़्तियार करके उसने अपने पाए हुए को भी खो दिया, और आइन्दा जो कुछ वह पा सकता था उसको भी। जब आप अपने हक़ के बराबर चाहते हैं तो आप वह चीज़ चाह रहे होते हैं जो सच में आपकी है, जो इन्साफ़ के मुताबिक़ आप ही को मिलनी चाहिए। मगर जब आप अपने वास्तविक हक़ से ज़्यादा चाहें तो मानो आप ऐसी चीज़ चाह रहे हैं जो इन्साफ़ के मुताबिक़ आपकी चीज़ नहीं है, बल्कि दूसरे की चीज़ है, फिर दूसरा शख़्स क्यों आपको अपनी चीज़ देने पर राज़ी हो जाएगा। जब भी आदमी अपने हक़ से ज़्यादा चाहे तो फ़ौरन उसका दूसरे से टकराव शुरू हो जाता है। दूसरे लोग उसकी राह में रुकावट बन कर खड़े हो जाते हैं। अब कशमकश और ज़िद पैदा हो जाती है। दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। इसके नतीजे में अक्सर ऐसा होता है कि आदमी अस्ल से ज़्यादा की चाह में अस्ल को भी खो बैठता है। अपने हक़ से ज़्यादा की चाह करते ही यह होता है कि आदमी विरोधाभास में घिर जाता है। वह अपने हिस्से की चीज़ लेने के लिए एक दलील देता है, और दूसरे के हिस्से की चीज़ पर कब्ज़ा करने के लिए दूसरी दलील इस्तेमाल करता है। इस तरह वह अपने मुक़द्दमे को ख़ुद ही कमज़ोर कर लेता है। वह अपना निषेध आप कर देता है। दो किस्म की दलीलों से वह साबित करता है कि पहली चीज़ अगर उसकी है तो दूसरी चीज़ उसकी नहीं है, और अगर दूसरी चीज़ उसकी है तो पहली चीज़ उसकी नहीं हो सकती।
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