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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۱۵
कि हमन अब तक कुछ नहीं पढ़ा। पढ़ लिख कर भी हम जाहिल रह गए।" मौजूदा ज़माने की मुस्लिम तहरीकों का यह निहायत सही नक्शा है। जिन चीज़ों की ज़िम्मेदारी खुदा ने ले रखी है, उनके नाम पर वे हंगामा करने में लगे हुए हैं और जिस चीज़ की ज़िम्मेदारी खुद उन पर डाली गई है, उसके लिए ये तहरीकें कुछ नहीं करतीं। "इस्लाम और इस्लामी प्रतीकों व चिन्हों पर हमला" जैसे मुद्दों पर हर आदमी जोश दिखा रहा है, हालांकि उनकी हिफाज़त करने वाला खुद खुदा है। पहला स्कूल इल्म और तालीम की अहमियत इस्लाम में इतनी ज़्यादा है कि हर दूसरी मसलहत पर इसको बड़ाई हासिल है। मौजूदा ज़माने में मुसलमान तालीम के मैदान में दूसरी कौमों से पीछे हो गए। और इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि मौजूदा ज़माने में जो तालीमी इदारे (शिक्षा-संस्थाएं) कायम हुए उनमें पढ़ाने वाले ज़्यादातर गैरमुस्लिम थे। मुसलमानों के लीडरों ने कहा कि ये गैरमुस्लिम उस्ताद हमारे बच्चों को खराब कर देंगे, इसलिए इन इदारों में मुसलमानों को दाखिल करना दुरुस्त नहीं। उसके नतीजे में मुसलमान तालीम में बहुत पीछे हो गए। यह सोच दुरुस्त न थी। इसका सबूत यह है कि इस्लाम की तारीख में जो सबसे पहला स्कूल खोला गया, उसके तमाम उस्ताद गैरमुस्लिम थे। यह स्कूल मदीना में मक्का के कैदियों के ज़रिए खोला गया जो सब के सब गैरमुस्लिम थे। कुछ लोग सुफ्फा को
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