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الرسالہ، جنوری ۲۰۲۵، صفحہ ۱۴
बचा नही सकता, चाह आप सुबह-शाम अपने घर में कुरआन का तिलावत करत हों और चाहे आपने अपने बच्चों और बच्चियों को दारुल-इस्लाह और जामियातु- स्सालिहात में तालीमी सनद (शैक्षिक प्रमाण पत्र) के लिए भेज रखा हो। इबरतनाक महमूद आलम साहब (श्रीनगर) ने अपना एक वाक़या लिखा है। उसका ख़ूलासा उन्हीं के लफ़्ज़ों में अख़बार दावत (10 अप्रैल 1990) से यहां नक़्ल किया जाता है। "हम चन्द दोस्त एक होटल में बैठे बातचीत कर रहे थे। यह होटल लेखकों, शायरों और पत्रकारों के लिए एक क्लब का काम करता था। रोज़ाना शाम को उसके हाल में जमा होकर लोग एक कप गर्म चाय के साथ दुनिया की सियासत से लेकर मुल्क के मसलों पर गर्मा-गर्म बहस कर सकते थे। हम में से हरेक वहां अपनी क़ाबलियत का जौहर दिखता था। जिस तरह मदारी की डुगडुगी पर मजमा लग जाता है, हमारी असरदार बातचीत से लोगों की भीड़ जमा होने लगी। आज हमारी बातचीत अरब और इस्राईल के दरम्यान होने वाली जंग के बारे में थी। हम जोश और जज़्बे से अपनी मालूमात पेश कर रहे थे। हमारे एक फ़ाज़िल दोस्त ने अपने अन्देशों का इज़हार करते हुए कहा कि अगर मुसलमानों की हालत यही रही तो बैतुलमक़्दिस का मिलना तो दूर रहा, अजब नहीं कि ख़ान-ए-काबा पर भी ग़ैरों का क़ब्ज़ा हो जाए। अभी हमारे दोस्त ने जुमला पूरा नहीं किया था कि एक देहाती मुसलमान बिगड़ गया, 'कुरआन पढ़ा है आपने?
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