Al-Risala · March 2026 · page 56

सब्र और सहनशीलता

الرسالہ، مارچ ۲۰۲۶، صفحہ ۵۶

कोशिशों का लगातार जारी रखा वह हर असफलता का अस्थायी मान और भावष्य के प्रति अपनी आशा को कभी समाप्त न होने दे। वह बीती बातों में उलझने के बजाय आगे की दिशा में बढ़ता रहे। भावनाओं में बहकर निर्णय लेने से बचे और यथार्थ पर आधारित योजनाओं को अपनाए। जीवन में यह हमेशा आवश्यक होता है कि व्यक्ति अपने अनुभवों के आधार पर अपने मामले का नए सिरे से आकलन करे और नई सोच के साथ आगे की योजना बनाए। यही बेहतर भविष्य की ओर बढ़ने का एकमात्र प्रभावी मार्ग है।

सब्र और सहनशीलता

पैगम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन की एक घटना है। एक अकाल पीड़ित इलाके में राहत कार्य के लिए आपने एक यहूदी व्यापारी से कुछ दीनार क़र्ज़ लिए। इस यहूदी का नाम ज़ैद बिन सअना था। ज़ैद बिन सअना से यह तय हुआ कि आप एक निश्चित समय के बाद 80 मिस्कल खजूरें अदा करेंगे। खजूरों की अदायगी के वक़्त में अभी दो-तीन दिन बाक़ी थे कि ज़ैद बिन सअना अचानक आए और बिगड़ते हुए अपने क़र्ज़ का तक़ाज़ा किया। उस समय आपके कंधे पर एक चादर थी। ज़ैद बिन सअना ने चादर को पकड़ कर ज़ोर से खींचा और कहा, “ऐ मुहम्मद, मेरा क़र्ज़ अदा क्यों नहीं करते। ख़ुदा की क़सम, मैं मुत्तलिब की औलाद को जानता हूं, वो सबके सब क़र्ज़चोर हैं।”

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