एक बेहतर भविष्य की ओर
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۶، صفحہ ۶۳
हाजरा और इस्माइल का रेगिस्तान में इस तरह बसाने का मक़सद एक नई नस्ल तैयार करना था। उस ज़माने की शहरी आबादियों में मूर्तिपूजक संस्कृति पूरी तरह छा चुकी थी। उस माहौल में जो भी पैदा होता, वह मूर्तिपूजक मानसिकता से प्रभावित हो जाता। इस वजह से, उसके लिए तौहीद के संदेश को समझना मुमकिन न रहता। सभ्य नगरों से दूर रेगिस्तान में हाजरा और इस्माइल को इसलिए बसाया गया, ताकि यहाँ प्राकृतिक वातावरण में उनके ज़रिए एक नई नस्ल तैयार हो—एक ऐसी नस्ल जो मूर्तिपूजक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त हो। पीढ़ी दर पीढ़ी यह प्रक्रिया जारी रही, यहाँ तक कि बनू इस्माइल क़बीला अस्तित्व में आ गया। इन्हीं के अंदर 570 ईस्वी में पैग़ंबर-ए-इस्लाम मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब पैदा हुए। मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को 610 ईस्वी में अल्लाह ने नबी नियुक्त किया। इसके बाद, आपने तौहीद के मिशन का आरंभ किया। बनू इस्माइल की संतानों में से वही कीमती व्यक्तित्व उभरे, जिन्हें असहाब-ए-रसूल (पैग़ंबर के साथी) कहा जाता है। इन्हीं लोगों को साथ लेकर पैग़ंबर ने इतिहास में पहली बार तौहीद (एकेश्वरवाद) के संदेश को वैचारिक स्तर से आगे बढ़ाकर सामाजिक बदलाव के स्तर तक पहुँचा दिया। हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) के ज़रिए ईश्वरीय संदेश की जो महान योजना अंजाम पाई, हज की इबादत दरअसल उसी का एक रिहर्सल है। ज़ुल-हिज्जा महीने की निर्धारित तारीख़ों में दुनिया भर के मुसलमान एक साथ इकट्ठा होकर रिहर्सल के रूप में उस इतिहास को दोहराते हैं, जो हज़रत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) और उनकी
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