अपना देवा के नाम पर बलिदान करने का इरादा किया।
الرسالہ، مئی ۲۰۲۶، صفحہ ۳
बैठकर अपने सेनापात सअद बिन अबी वक्कास (रज़ि०) के पास पहुचा जब सअद (रज़ि०) को पता चला तो उन्होंने कहा:
"ख़ुश हो जाओ! ख़ुदा की क़सम, अल्लाह ने हमें इनके राज्य की चाबियाँ दे दी हैं। (यानि इसे उनकी ज़मीन जीतने की निशानी समझो)" (अल-बिदाया व अल-निहाया, खंड 7, पृष्ठ. 42)। एक ही मा'बूद रसूलुल्लाह (सल्ल०) की वफ़ात 63 साल की उम्र में मदीने में हुई। उस समय लोगों में अजीब दीवानगी छा गई। बहुत से लोगों को यह विश्वास ही नहीं होता था कि आपका इन्तक़ाल हो सकता है या इन्तक़ाल हो गया। हज़रत उमर फ़ारूक़ इस दीवानगी में सबसे आगे थे। वह मदीने की मस्जिद नबवी में तलवार लेकर खड़े हो गए और कहने लगे कि जो शख़्स कहेगा कि रसूलुल्लाह नहीं रहे मैं इस तलवार से उसकी गर्दन उड़ा दूंगा। मस्जिद नबवी में ज़बरदस्त तनाव और सन्नाटा था लोग बहुत हठात् और परेशान नज़र आ रहे थे। इतने में हज़रत अबूब्रक वहां आए और उन्होंने इस स्थिति को भांपा और इसके बाद मस्जिद के एक तरफ़ भाषण करने को खड़े हो गए। अपने भाषण में उन्होंने यह ऐतिहासिक वाक्य कहा: “जो शख़्स