अपनी कमज़ोरी
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۶، صفحہ ۵۷
प्रसिद्ध वैज्ञानिक आंइस्टीन (Einstein) ने भौतिक विज्ञान के एक सिद्धांत को इस तरह बयान किया हैः "Energy can neither be created nor destroyed."
(ऊर्जा न उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट की जा सकती है।)
यह तथ्य ईश्वर की असीम शक्ति का प्रमाण है। इंसान इस दुनिया को सिर्फ इस्तेमाल कर सकता है। वह इसे बदलने या मिटाने में सक्षम नहीं है। इससे यह भी पता चलता है कि इस दुनिया में इंसान की असली हैसियत क्या है। इंसान इस दुनिया का मालिक नहीं है, बल्कि एक अधीन व्यक्ति है। इसी स्थिति को धार्मिक शब्दों में "परीक्षा" कहा जाता है। इंसान इस दुनिया में इसलिए आता है ताकि वह सीमित समय के भीतर अपनी परीक्षा का उत्तर लिख सके। इसके बाद उसे यहां से चले जाना होगा। इसके अलावा किसी और चीज़ पर उसे कोई पूर्ण अधिकार नहीं। कुछ लोग दुनिया की परेशानियों से हार मानकर आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं। उन्हें लगता है कि खुद को मिटाकर वे अपनी समस्याओं का अंत कर देंगे। लेकिन यह सोचना एक भ्रांति है। जैसे भौतिक दुनिया की ऊर्जा को नष्ट नहीं किया जा सकता—क्योंकि वह किसी न किसी रूप में बनी रहती है—उसी तरह उस ऊर्जा को भी समाप्त नहीं किया जा सकता जो एक इंसान के रूप में अस्तित्व में आई है। जीवन कोई मिटने वाली चीज़ नहीं, बल्कि एक निरंतरता है, जो इस दुनिया से आगे भी अपना स्वरूप बनाए रखती है।
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