الرسالہ، مارچ ۲۰۲۶
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और स्थायी था। इस मौक़े पर मर्द की तरफ़ से औरत को जो महर दी जाता है, वह मुआवज़ा या क़ीमत नहीं है, वह दरअसल एक प्रतीक राशि (token money) है। महर के रूप में मर्द एक प्रतीक - राशि अदा करके इस बात का प्रण करता है कि वह निकाह की तमाम दीनी और इन्सानी ज़िम्मेदारियों को निभाएगा। दीन के मुताबिक़ महर की मात्रा ऐसी होनी चाहिए, जिसका अदा करना आसान हो। महर की ज़िम्मेदारी मर्द पर डालने की वजह यह है कि मर्द ज़्यादा ताक़तवर है। इसलिए मेहर की ज़िम्मेदारी मर्द (सिन्फे-क़वी) पर डाली गई, ताकि उसको उसकी खास ज़िम्मेदारी याद दिलाई जाए। हज़रत अनस बिन मालिक मशहूर सहाबी हैं। वह कहते हैं कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कि बन्दे ने जब निकाह किया तो उसने आधे दीन पर अमल कर लिया। तो उसको चाहिए कि वह बाक़ी आधे दीन में अल्लाह से डरे। (शुअबुल ईमान, हदीस संख्या 5487) इस हदीस की रोशनी में जायज़ा लीजिए तो मालूम होगा कि मौजूदा ज़माने के मुसलमान निकाह और दाम्पत्य ज़िन्दगी के मामले में सिर्फ़ आधे दीन की हद तक दीनदार हैं। बाक़ी आधे दीन के मामले में वे बेदीन बने हुए हैं। इन ग़ैर-दीनी तरीक़ों में से, एक घृणित चीज़ वे फिजूलखर्ची वाली रस्में हैं, जो शादी के मौक़े पर रिवाज के तौर पर ज़रूरी बन गई हैं। इन ग़लत रस्मों ने
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