Al-Risala · January 2026 · page 2

सादा ज़िन्दगी

الرسالہ، جنوری ۲۰۲۶، صفحہ ۲

इसका एलान भी किया गया हो, और निकाह करने वाला मद न निकाह करने वाली औरत को जरूरी महर अदा कर दी हो। इससे अन्दाज़ा किया जा सकता है कि इस्लाम में निकाह और शादी का मामला कितना ज़्यादा सादा और सहज है। मगर मौजूदा ज़माने में मुस्लिम शादियों में ऐसे ग़लत रिवाज शामिल हो गए हैं, जिन्होंने एक जायज़ काम को नाजायज़ काम में तब्दील कर दिया है। एक यह कि शादी को ख़ानदानी सम्मान का मसला समझा जाता है। इसके नतीजे में निकाह का सादा इस्लामी आयोजन बनावटी धूम और बेजा नुमाइश की चीज़ बन गया है। इस धूम और नुमाइश को क़ायम रखने के लिए लोग लुट जाते हैं। जायदादें बेच देते हैं और हमेशा के लिए क्रज़ की लानत में फंस जाते हैं। एक दिन की धूमधाम के दिखावे की खातिर वह अपनी पूरी ज़िन्दगी को बे-धूम बना लेते हैं। ये तमाम चीजें सरासर ग़ैर-इस्लामी है हैं। हक़ीक़त यह है कि निकाह का आयोजन बेहद सादा और बेखर्च होना चाहिए। वह ऐसा होना चाहिए जैसे नमाज़ का वक़्त आया और आदमी ने मसजिद में जाकर नमाज़ पढ़ ली। निकाह और शादी को एक संजीदा कर्तव्य की अदायगी का दिन होना चाहिए, न कि निजी या खानदानी शानो शौकत के इज़हार का दिन। हज़रत आयशा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फरमायाः

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