ME AND MAULANA: A PERSONAL RECOLLECTION OF WAHIDUDDIN KHAN - John M. Butt
Al-Risala (English), August-September 2021, p. 187
By Maulana Wahiduddin Khan
Maulana Wahiduddin Khan is named as the default author of the periodical; a piece that carries another writer’s byline is credited to that writer.
से प्रार्थना के बाद कुछ कहने की बातत होतती रहतती थी, लेकिन मौलाना ने बातत सुनतते ही इनकार में सिर हिलायया। एकदम इनकार! लेकिन बापू जिस पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर प्रार्थना करतते थे, वहाँ देर ततक बैठे रहे। पीपल जैसे लाखों पत्तिययों वाला अपना हाथ ऊपर लहरा रहा था। धीरे से बोले— “ययहाँ बोलना क्या, ययहाँ ततो सारे पत्ते भी प्रार्थना करतते रहतते हैं। इनहें सुनें हम!” दूसरे दिन बहुतत इसरार के बाद वे प्रार्थना के अंतत में कुछ बोले भी, लेकिन मुझे ययाद ततो इततना ही रहा कि ययहाँ पत्ते भी प्रार्थना करतते हैं, इनहें सुनें हम! अब वह आवाज़ सुनाई नहीं देगी। मौतत का मततलब ही उततनी दूर का सफ़र होतता है, जिततनी दूर से आतती आवाज़ न सुनाई देतती है, न इंसान उततनी दूर से दिखाई देतता है, लेकिन एक सार्थक व पवित्र जीवन का मततलब ही ययह होतता है कि काल और वक़्त की दूरी पार कर भी उसकी गूँज उठतती रहतती है। मौलाना वहीदुद्ीन ख़ान वैसी ही गूँज बनकर हमारे बीच रहेंगे। वे आपादमस्तक मनुष्य थे - समतता मार्ग (samtamarg.in) मौलाना मेरे मार्गदर्शक मययंक पुरी, फ़रीदाबाद 2016 में जब मैंने CPS को जॉइन कियया, ततब ययुवा होने की वजह से मेरे अंदर काफ़ी ग़ुससा था और काफ़ी अपरिपक्वतता (immaturity) थी, लेकिन मौलाना के साथ रहकर और उनके लेकचर को सुनकर मैंने अपने ग़ुससे पर क़ाबू पाना सीखा और धीरे-धीरे अपरिपक्वतता (immaturity) को समाप्त कियया। मौलाना से मैंने बहुतत-सी बाततें सीखीं, जिनमें से एक बातत है— अपनी ग़लतती का एहसास करना और ततुरंतत कहना कि—I was wrong. चूँकि ययह कहतते ही मैं सोचने लगतता हूँ कि मुझसे ग़लतती कहाँ हुई। इससे मेरा ग़ुससा शांतत हो जातता है।

‹ Previous page Next page › About this issue Open in the reader