कुदरत का फ़ैसला
الرسالہ، مارچ ۲۰۲۳، صفحہ ۶۱
तुम्हारी कामयाबी इसम ह कि हम सच्चाई का मानत हुए इसस बचन का तदबीर तलाश करें। और वह तदबीर यह है कि कांटों से बच कर फूल को हासिल करें। कांटों में न उलझते हुए फूल तक पहुंचने की कोशिश करें। फूल के साथ कांटे का होना कोई सादा बात नहीं। यह फ़ितरत और कुदरत की जुबान में इन्सान के लिए सबक़ है। यह प्रकृति की भाषा में इन्सानी हक़ीक़त का ऐलान है। यह उस फ़ितरी मनसूबे का परिचय है, जिसके मुताबिक़ ख़ुदा ने मौजूदा दुनिया को बनाया है। इसका मतलब यह कि इस दुनिया में वही क़दम कामयाब होता है जो बच कर चलने के उसूलों के मुताबिक़ हो। जहां बचने की ज़रूरत हो वहां उलझना, जहां तदबीर की ज़रूरत हो वहां एजीटेशन करना सिर्फ़ अपनी नालायक़ी (अयोग्यता) का ऐलान करना है। ख़ुदा ने जिस मौक़े पर बच कर चलने का तरीक़ा इख़्तियार करने का हुक्म दिया हो, वहां उलझने का तरीक़ा इख़्तियार करना ख़ुद अपने आपको मुजरिम बनाना है। चाहे आदमी ने दूसरों को मुजरिम साबित करने के लिए डिक्शनरी के तमाम अल्फाज़ दोहरा डाले हों। ख़ुदा का सबूत अगर एक इन्सान का वजूद है तो ख़ुदा का वजूद क्यों नहीं? अगर हवा और पानी, दरख़्त और पत्थर, चांद और सितारे मौजूद हैं तो उनको वजूद देने वाले का वजूद संदिग्ध क्यों? हक़ीक़त यह है कि रचना की मौजूदगी रचना-प्रक्रिया का सबूत है। और इन्सान को मौजूदगी इस बात का सबूत है कि यहां एक ऐसा सृष्टा मौजूद है, जो देखे और सुने, जो सोचे और घटनाओं को प्रकट रूप दे।
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