ख़ुदा का सबूत
الرسالہ، جولائی ۲۰۲۳، صفحہ ۵
अब दूसरे आदमी ने दुआ शुरू की। उसने कहा, "ऐ ख़ुदा, मेरे चाचा का एक लड़का थी। वह मुझे बहुत प्रिय थी। उससे मुझे इतनी ज़्यादा मुहब्बत थी जो मर्दों को औरतों से होती है। मैंने उससे अपनी काम-वासना तृप्त करनी चाही पर वह मना करती रही। कुछ अर्सै बाद अकाल पड़ा और वह मुसीबत में फंस गई। वह मदद के लिए मेरे पास आई। मैंने उसको 120 दीनार इस शर्त पर दिए कि वह मुझको अपने ऊपर क़ाबू दे दे। वह इसके लिए तैयार हो गई। यहां तक कि जब मैं उसके ऊपर पूरी तरह हावी हो गया और उसके दोनों पैरों के बीच बैठ गया तो उसने कहा, 'ख़ुदा से डर और मुहर को उसके हक़ के बिना न तोड़ा।' तो मैंने उसे छोड़ दिया हालांकि वह मुझको तमाम लोगों में सबसे ज़्यादा प्रिय थी। और जो दीनार मैंने उसको दिए थे वे भी उससे वापस नहीं लिए। ऐ ख़ुदा, अगर मैंने यह काम तेरी खुशी के लिए किया है तो उस मुसीबत से तू हमको निकाल जिसमें हम इस वक़्त फंसे हुए हैं।" तो चट्टान थोड़ी-सी हट गई, पर इतनी नहीं कि वे निकल सकें। अब तीसरे आदमी ने दुआ की। उसने कहा, "ऐ ख़ुदा, मैंने कुछ मज़दूरों से काम कराया। काम के बाद मैंने सबको मज़दूरी दे दी। पर एक मज़दूर अपनी मज़दूरी छोड़ कर चला गया। मैंने उसकी छोड़ी हुई रक्म को कारोबार में लगा दिया। उससे मुझको बहुत ज़्यादा फायदा हुआ। कुछ अर्सै बाद वह आदमी वापस आया और कहा, 'ऐ अल्लाह के बन्दे! मेरी मज़दूरी मुझे दे दो।' मैंने उससे कहा, 'ये ऊंट, ये गायें, ये बकरियां और ये गुलाम जो तुम देख रहे हो, यह सब तुम्हारी मज़दूरी है।' उसने कहा, 'ऐ ख़ुदा के बन्दे! मुझसे मज़ाक़ न कर। मैंने उससे कहा कि मैं तुमसे मज़ाक़ नहीं कर
‹ Previous page Next page › Contents of July 2023 All issues